५१ शक्तिपीठ
नाम, स्थान और महत्व
५१ शक्तिपीठ वे पावन स्थान हैं जहाँ माता सती के अंग और आभूषण गिरे, कामाख्या से हिंगलाज तक, प्रत्येक में भैरव रक्षक हैं।
शक्तिपीठों की पावन प्राकट्य कथा
देवी भागवत पुराण के सप्तम स्कंध, अध्याय ३० में वर्णन है कि प्रजापति दक्ष की पुत्री माता सती ने अपने पिता के यज्ञ में पति महादेव का सम्मान न होने पर देह त्याग दी। शिव पुराण में भी यह प्रसंग आता है। शोक से व्याकुल भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लेकर संपूर्ण ब्रह्मांड में विचरण करने लगे।
सृष्टि का संतुलन बनाए रखने और शिव का शोक शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती की देह को विभक्त किया। पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ माता के अंग, आभूषण और पावन चिह्न गिरे, वहाँ शक्तिपीठ प्रकट हुए। प्रत्येक शक्तिपीठ में भगवान शिव भैरव रूप में विराजमान होकर शक्ति की रक्षा करते हैं।
५१ की गणना को कैसे समझें
भक्ति परंपरा में ५१ शक्तिपीठों की चर्चा होती है, किंतु ग्रंथों में गणना अलग-अलग मिलती है। देवी भागवत पुराण के सप्तम स्कंध का तीसवाँ अध्याय देवी के १०८ पावन स्थानों के नाम बताता है, कुलार्णव तंत्र में १८, कुब्जिका तंत्र में ४२ और कालिका पुराण में सात पीठों का उल्लेख है। पीठनिर्णय, जिसे महापीठनिरूपण भी कहा जाता है, ५१ पीठों की गणना करता है और प्रत्येक पीठ में देवी के एक स्वरूप को एक भैरव के साथ जोड़ता है।
ग्रंथों और मंदिर परंपराओं में कभी-कभी एक ही पीठ के अंग, देवी के नाम या भैरव के नाम भिन्न बताए जाते हैं। इसलिए नीचे की सारणी एक प्रचलित सूची का अनुसरण करती है और इसे भक्ति-मार्गदर्शिका के रूप में देखना उचित है, अंतिम सूची के रूप में नहीं।
चार आदि शक्तिपीठ
शास्त्र और परंपरा चार पीठों को प्रथम और सर्वाधिक शक्तिशाली मानती है। ये हैं असम का कामाख्या, जहाँ माता सती की योनि गिरी मानी जाती है, ओडिशा के पुरी में विमला पीठ, जो चरणों से जुड़ा है, पश्चिम बंगाल का कालीघाट, जो दाहिने पैर की उँगलियों से जुड़ा है, और ओडिशा में बरहामपुर के निकट तारा तारिणी, जो स्तन से जुड़ा है। अनेक तीर्थयात्री इन्हीं चार से यात्रा आरंभ करते हैं।
आदि शंकराचार्य से संबद्ध एक स्तोत्र में अठारह महाशक्तिपीठों की सूची मिलती है। इनमें गुवाहाटी का कामाख्या, गया की सर्वमंगला और उज्जैन की महाकाली माता के सृजन, पालन और संहार के कार्य के प्रतीक रूप में पूज्य हैं।
भारत के प्रमुख पावन शक्तिपीठ
संपूर्ण उपमहाद्वीप में फैली तीर्थयात्रा
शक्तिपीठ भारत की प्राचीन सांस्कृतिक भौगोलिकता का अनुसरण करते हैं। ५१ पीठों की सूचियाँ वर्तमान भारत, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान और तिब्बत के स्थानों का उल्लेख करती हैं। नेपाल का मुक्तिनाथ शाक्तों और वैष्णवों दोनों के लिए पूज्य है। बांग्लादेश में जेशोरेश्वरी और सुगंधा के पीठ इस परंपरा से जुड़े हैं, और श्रीलंका के नैनातिवु में इंद्राक्षी का मंदिर भी इनमें गिना जाता है। कैलाश पर्वत के निकट मानसरोवर का पाषाण पीठ उस देवी की अनुभूति को पूर्ण करता है जिनका शरीर स्वयं पावन भूमि है।
असम के नीलाचल पर्वत की विशेषता यह है कि वहाँ गर्भगृह में कोई गढ़ी हुई मूर्ति नहीं है। भक्त शिला की दरार से बहने वाली प्राकृतिक जलधारा की पूजा करते हैं। ज्वालामुखी में देवी की आराधना बिना किसी ईंधन के चट्टान से उठती ज्वालाओं के रूप में होती है।
शक्ति उपासना व साधना का मर्म
शक्तिपीठों की यात्रा साधक के अंतर्मन में दिव्य ऊर्जा का संचार करती है:
- •भक्तजन मातृ शक्ति के प्रति कृतज्ञता और अनन्य समर्पण भाव से वंदना करते हैं।
- •यहाँ वैदिक एवं तांत्रिक दोनों पद्धतियाँ मंत्र जप, कुमकुम अर्चन एवं ध्यान के रूप में एक साथ मिलती हैं।
- •शक्ति और शिव (भैरव) की युगल उपासना अद्वैत चेतना और अखंड सामंजस्य का साक्षात्कार कराती है।
नवरात्रि, जो देवी को समर्पित नौ रातें हैं, इन तीर्थों में भक्ति का सबसे प्रबल काल माना जाता है।
पावन महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र
आदि पराशक्ति की पावन स्तुति:
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि
विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोधिनिवासिनि
विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि
दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
क्या आप जानते हैं?
कामाख्या में प्राकृतिक जलधारा
कामाख्या मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि शिलाखंड से प्रस्फुटित होने वाले पावन प्राकृतिक जल स्रोत की पूजा होती है।
ज्वालाजी की अखंड ज्योति
हिमाचल के ज्वालाजी मंदिर में किसी तेल या बाती के बिना चट्टानों से निकलने वाली प्राकृतिक नीली ज्वालाओं की पूजा की जाती है।
शक्ति व भैरव का युगल स्वरूप
प्रत्येक शक्तिपीठ के साथ एक पावन भैरव मंदिर अवश्य होता है जो शिव और शक्ति की अभिन्नता का प्रमाण है।
अखंड भौगोलिक विस्तार
५१ शक्तिपीठों की सूचियाँ भारत, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान और तिब्बत तक संपूर्ण पावन उपमहाद्वीप में फैली हैं।
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