मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे
यह एक प्रसिद्ध भजन है जो संत कबीर द्वारा रचित है। इसमें कबीर कहते हैं कि ईश्वर को कहीं दूर नहीं, बल्कि अपने ही अंदर और हर साँस में खोजना चाहिए।
श्लोक
हे बंदे, तू मुझे कहाँ ढूँढ़ रहा है? मैं तो तेरे निकट ही हूँ। न तो मैं मंदिर में हूँ, न मस्जिद में, और न काबा या कैलाश में।
श्लोक 1
न तो मैं किसी क्रिया-कर्म में हूँ, न योग और वैराग्य में। यदि तू सच्चा खोजी है, तो मुझे तुरंत मिल जाऊँगा – बस एक पल की तलाश में।
श्लोक 2
कबीर कहते हैं, हे भाई साधो, सुनो – मैं प्रत्येक श्वास के भीतर की श्वास में विद्यमान हूँ॥
श्लोक 3
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह भजन संत कबीर की रचनाओं में से एक है, जो 15वीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन से जुड़े हैं। कबीर की वाणी निर्गुण भक्ति परंपरा का हिस्सा है, जो बिना रूप-गुण के एक परम सत्य की उपासना पर जोर देती है। यह भजन अक्सर सत्संगों, भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक चिंतन के समय गाया या सुना जाता है। इसमें कबीर बाहरी रीति-रिवाजों और स्थानों (मंदिर, मस्जिद, काबा, कैलाश) को नकारते हुए ईश्वर को हृदय में और हर साँस में अनुभव करने का संदेश देते हैं। यह पद लोक-परंपरा और मुद्रित संकलनों (हिन्दवी, कविताकोश) में कबीर के नाम से मिलता है; हम इसे किसी विशिष्ट पांडुलिपि या बीजक से नहीं जोड़ पाए, और गायन के पाठों में दूसरी पंक्ति के शब्द कुछ भिन्न मिलते हैं। ईश्वर किसी मंदिर से अधिक निकट, साधक के अपने हृदय और श्वास में है, यह भाव भगवद्गीता (18.61) में भी मिलता है: प्रभु सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।
क्या आप जानते हैं?
रचनाकार
यह पद 15वीं सदी के महान संत कवि कबीरदास का है। कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता और आंतरिक साधना पर बल दिया। उनकी वाणी आज भी लोकप्रिय है।
भाषा एवं शैली
यह पद सधुक्कड़ी भाषा में लिखा गया है, जो हिंदी, ब्रज और अवधी का मिश्रण है। अंत में 'कहैं कबीर' की छाप होने के कारण यह गेय और याद रखने में आसान है।
मूल संदेश
कबीर कहते हैं कि ईश्वर मंदिर, मस्जिद या तीर्थों में नहीं, बल्कि हर प्राणी के भीतर और हर सांस में विद्यमान हैं। बाहरी आडंबरों की बजाय आंतरिक खोज ज़रूरी है।
काव्यगत विशेषता
'ना मैं देवल ना मैं मसजिद' की पुनरावृत्ति से कबीर बाहरी पूजा-स्थलों की सीमाओं को तोड़ते हैं। 'पल भर की तलास' से तात्पर्य है कि ईश्वर की प्राप्ति एक क्षण की सच्ची खोज में ही संभव है।
सांस का प्रतीक
'सब स्वाँसों की स्वाँस में' – यहाँ 'स्वाँस' का अर्थ है प्राणवायु या जीवनधारा। कबीर के अनुसार, परमात्मा हर सांस में बसते हैं, यानी जीवन स्वयं दिव्य है।
Sant Kabir
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