कबीर के भजन
चदरिया और जीवन का रूपक
कबीर का भजन: शरीर एक झीनी चादर है, जो राम-नाम के रस में रँगी है और जिसे ज्यों की त्यों लौटाना है।
श्लोक
जब हम पैदा हुए तो सब संसार हँसा और हम रोए; ऐसे कर्म करके जीवन बिताओ कि अंत में हम हँसें और जग रोए।
श्लोक 1
यह चदरिया अत्यंत पतली और नाजुक है, और राम नाम के रस में सराबोर है।
श्लोक 2
आठ कमलों का चरखा और पाँच तत्वों की पूनी बनाई; नौ-दस महीने बुनने में लगे, पर मूर्ख मन ने इसे मैला कर दिया। फिर भी चदरिया उतनी ही पतली और रामरस में भीनी है।
श्लोक 3
जब मेरी यह चादर बनकर घर आई, तो मैंने इसे रंगरेज को दिया; उसने ऐसा रंग रंगा कि वह पूरी तरह लाल हो गई। और चदरिया वैसी ही पतली और रामनाम के रस में भीनी है।
श्लोक 4
इस चादर को पहनकर संदेह मत करो - यह तुम्हें केवल दो दिन के लिए दी गई है। मूर्ख लोग इसका रहस्य नहीं जानते और दिन-दिन इसे मैला करते रहते हैं। किंतु चदरिया तो पतली और रामरस से भीनी है।
श्लोक 5
ध्रुव, प्रह्लाद और सुदामा ने यह चदरिया ओढ़ी; शुकदेव ने इसे निर्मल रखा। दास कबीर ने इसे ऐसे ओढ़ा कि ज्यों की त्यों सुरक्षित रखी। हाँ, वह राम नाम के रस में भीगी हुई पतली चदरिया ही है।
श्लोक 6
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह भजन संत कबीर (15वीं शताब्दी) का माना जाता है, जो भक्ति-काल के जुलाहे-कवि थे और कबीर पंथ तथा संत मत में आदर से गाए जाते हैं। इसका प्रतीक 'चदरिया' है, एक झीनी चादर जो मानव शरीर है: आठ कमल का चरखा, पाँच तत्व की पूनी, गर्भ में नौ-दस मास की बुनाई और रंगरेज के रूप में ईश्वर। अंतिम पद में ध्रुव, प्रह्लाद, सुदामा और शुकदेव का नाम आता है, जिन्होंने चादर को बेदाग़ ओढ़ा; इनकी कथाएँ भागवत पुराण में हैं (ध्रुव 4.8-4.12, प्रह्लाद 7.4-7.10, सुदामा 10.80-81)। 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' पद कई पाठों में प्रचलित है (कविता कोश में इड़ा-पिंगला वाला पाठ है); यहाँ भजन के रूप में गाया जाने वाला पाठ है, जिसके आरंभ में 'कबीरा जब हम पैदा हुए' दोहा, जो लोकमान्यता में कबीर का माना जाता है, टेक से पहले रखा गया है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।
क्या आप जानते हैं?
रचना का अर्थ
इस भजन में कबीर ने मानव शरीर को एक पतली चादर (चदरिया) की उपमा दी है जो राम नाम के रस में भीनी है। यह शरीर अस्थायी है और इसे संभाल कर रखना चाहिए।
चरखे और पूनी का प्रतीक
'अष्ट-कमल का चरखा' शरीर के आठ चक्रों को दर्शाता है, और 'पाँच तत्व की पूनी' पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पाँच तत्व हैं। 'नौ-दस मास' गर्भावस्था का समय है जिसमें शरीर बनता है, लेकिन अज्ञानी इसे मैला कर देते हैं।
रंगरेज का प्रसंग
जब शरीर तैयार होता है तो इसे 'रंगरेज' (ईश्वर) को दिया जाता है। वह इसे भक्ति के रंग में लाल रंग देता है, यानी प्रेम और भक्ति से रंग देता है।
चादर की नश्वरता
यह चादर केवल दो दिन (थोड़े समय) के लिए दी गई है, इसे मैला न करें। मूर्ख लोग इसका भेद नहीं जानते और इसे रोज़ गंदा करते रहते हैं।
महान भक्तों का उदाहरण
ध्रुव, प्रह्लाद, सुदामा और शुकदेव जैसे भक्तों ने इस चादर (शरीर) को पवित्र रखा। कबीर कहते हैं कि उन्होंने इसे वैसे ही रखा जैसे मिला था - निर्मल।
पहली पंक्ति का संदर्भ
'कबीरा जब हम पैदा हुए' वाली पंक्ति जीवन के मूल्य को दर्शाती है - जन्म के समय हम रोते हैं और संसार हँसता है, लेकिन मृत्यु के समय ऐसा जीवन जिएँ कि हम हँसें और संसार रोए।
Rama
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