गुरुद्वारा शीश गंज साहिब
गुरु तेग बहादुर जी के सर्वोच्च बलिदान का पावन तख्त
गुरुद्वारा शीश गंज साहिब पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक का वह परम पावन स्थल है जहाँ सिखों के नौवें गुरु, 'हिन्द दी चादर' श्री गुरु तेग बहादुर जी ने 1675 ईस्वी में धर्म, मानवीय गरिमा और अंतरात्मा की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु अपना सर्वोच्च शीश बलिदान दिया था। श्रद्धालु यहाँ पावन वटवृक्ष, ऐतिहासिक कुआँ, निरंतर गुरबाणी कीर्तन और अखंड लंगर में सम्मिलित होकर आत्मिक शांति व निर्भयता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
त्वरित तीर्थ मार्गदर्शिका (एक दृष्टि में)
- •यह क्या है: सिखों के नौवें गुरु, 'हिन्द दी चादर' श्री गुरु तेग बहादुर जी तथा उनके परम शिष्यों—भाई मती दास जी, भाई सती दास जी एवं भाई दयाला जी का पावन शहीदी स्थल (शहादत पीठ), जहाँ उन्होंने 1675 ईस्वी में धर्म और अंतरात्मा की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुति दी।
- •दर्शन एवं पाठ का फल: मन से भय और अहंकार का निवारण, आत्मिक शांति तथा निर्भयता (निर्भय पद) की प्राप्ति। गुरु तेग बहादुर जी रचित सलोक महला ९ का श्रवण व पठन जीवन की नश्वरता से मुक्ति दिलाकर परमात्मा में लीन करता है।
- •कब जाएँ: वर्ष के सभी 365 दिन, 24 घंटे खुला। नवंबर/दिसंबर में शहीदी गुरुपर्व एवं प्रकाश पर्व पर यहाँ दिव्य आध्यात्मिक उल्लास रहता है।
- •कहाँ स्थित है: चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली, भारत। लाल किले के सामने। निकटतम मेट्रो स्टेशन: चांदनी चौक (येलो लाइन)।
- •विधि एवं मर्यादा:
- •सिर को रुमाल या दुपट्टे से ढकें और जूता-घर (जोड़ा घर) में जूते-चप्पल उतारें।
- •'चरण गंगा' के पवित्र जल में हाथ-पैर धोकर प्रवेश करें।
- •मुख्य दरबार साहिब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के समक्ष श्रद्धापूर्वक माथा टेकें।
- •निरंतर हो रहे गुरबाणी कीर्तन का श्रवण करें, परिक्रमा करें, कड़ाह प्रसाद ग्रहण करें, पावन कुएँ का अमृत जल पिएँ और 24 घंटे चलने वाले गुरु के लंगर में प्रसादी ग्रहण करें।
पावन उद्भव एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुग़ल शासक औरंगज़ेब की धर्मांध नीतियों के कारण जब कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार बढ़ गए, तब पंडित कृपा राम के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल आनंदपुर साहिब में नौवें पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी की शरण में पहुँचा। उन्होंने अपनी संस्कृति व धर्म की रक्षा की गुहार लगाई। गुरु साहिब ने विचार व्यक्त किया कि इस समय किसी महापुरुष के सर्वोच्च बलिदान की आवश्यकता है। उनके सुपुत्र बाल गोबिंद राय (बाद में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी) ने सहजता से कहा कि संसार में आपसे बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है!
सत्य और मानवाधिकार की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी अपने तीन प्रमुख शिष्यों—भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला जी के साथ दिल्ली आए। जब गुरु जी ने इस्लाम स्वीकार करने या चमत्कार दिखाने से इनकार कर दिया, तो उनके सामने ही उनके शिष्यों को अमानवीय यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया—भाई मती दास जी को आरे से चीर दिया गया, भाई दयाला जी को उबलती देग में उबाला गया और भाई सती दास जी को रुई में लपेटकर जला दिया गया। गुरु साहिब पूर्णतः ईश्वरीय रज़ा में अडिग रहे। अंततः 11 नवंबर 1675 (मघर सुदी 5) को चांदनी चौक की कोतवाली में वटवृक्ष के नीचे गुरु साहिब का पावन शीश कलम कर दिया गया।
इसके पश्चात भाई जैता जी (बाबा जीवन सिंह जी) ने असीम साहस दिखाते हुए गुरु साहिब का पवित्र शीश आनंदपुर साहिब पहुँचाया, और लखी शाह वणजारा ने अपने ही घर को आग लगाकर गुरु साहिब के पवित्र धड़ का अंतिम संस्कार रकाब गंज में किया। वर्ष 1783 में सरदार बघेल सिंह जी के नेतृत्व में खालसा सेना ने दिल्ली पर अधिकार किया और इस पावन शहादत स्थल पर गुरुद्वारा शीश गंज साहिब की स्थापना की।
प्रमुख पावन स्थल व संरचनाएं
संत, गुरु परंपरा एवं ऐतिहासिक विभूतियाँ
- •श्री गुरु तेग बहादुर जी (1621–1675 ई.): सिखों के नौवें गुरु, जिन्हें संपूर्ण मानवता के अधिकारों की रक्षा के लिए 'हिन्द दी चादर' कहा गया।
- •भाई मती दास, भाई दयाला एवं भाई सती दास जी: अद्वितीय निष्ठावान सिख शहीद जिन्होंने गुरु चरणों में हँसते-हँसते प्राण त्याग दिए।
- •भाई जैता जी (बाबा जीवन सिंह जी): जिन्होंने मुग़ल पहरे के बीच से गुरु साहिब का शीश आनंदपुर साहिब पहुँचाया, जिन्हें दशमेश पिता ने "रंगरेटा गुरु का बेटा" का वरदान दिया।
- •भाई लखी शाह वणजारा: अनन्य श्रद्धालु जिन्होंने गुरु साहिब के धड़ के संस्कार हेतु अपना पूरा घर जला दिया।
- •सरदार बघेल सिंह जी (1730–1802 ई.): करोड़ी मिसल के प्रतापी जरनैल जिन्होंने 1783 में दिल्ली जीतकर इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे का निर्माण करवाया।
पावन गुरबाणी श्लोक एवं ध्यान
ਸਲੋਕ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਬਲੁ ਛੁਟਕਿਓ ਬੰਧਨ ਪਰੇ ਕਛੂ ਨ ਹੋਤ ਉਪਾਇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਅਬ ਓਟ ਹਰਿ ਗਜ ਜਿਉ ਹੋਹੁ ਸਹਾਇ ॥੫੩॥
ਬਲੁ ਹੋਆ ਬੰਧਨ ਛੁਟੇ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਹੋਤ ਉਪਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੁਮਰੈ ਹਾਥ ਮਹਿ ਤੁਮ ਹੀ ਹੋਤ ਸਹਾਇ ॥੫੪॥
सलोक महला ९ (श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग १४२९)
भावार्थ एवं हिंदी अनुवाद:
"(जीव कहता है) सांसारिक शक्ति समाप्त हो गई, बंधनों ने जकड़ लिया है और कोई उपाय नहीं सूझता। हे नानक! कहो कि अब केवल प्रभु की ही शरण है, जैसे आपने डूबते हुए गजराज की रक्षा की थी, वैसे ही मेरी रक्षा करें। (53)
(प्रभु कृपा से) आत्मिक बल जागृत हो गया, सब बंधन कट गए और सभी उपाय सिद्ध होने लगे। हे नानक! सब कुछ प्रभु आपके ही हाथ में है, और आप ही अंततः सबके सहायक हैं। (54)"
क्या आप जानते हैं?
गुरुद्वारा परिसर में वह पावन स्थान और वटवृक्ष का तना आज भी शीशे के भीतर सुरक्षित है, जिसके नीचे गुरु तेग बहादुर जी ने शहादत दी थी।
यहाँ स्थित ऐतिहासिक कुएँ (खू साहिब) का मीठा जल आज भी श्रद्धालुओं को अमृत के रूप में वितरित किया जाता है, जिसका उपयोग गुरु जी ने कारावास के समय किया था।
1783 ईस्वी में खालसा जरनैल सरदार बघेल सिंह जी ने मुगल राजस्व अभिलेखों और प्रत्यक्षदर्शी बुजुर्गों की गवाही से इस सटीक शहादत स्थल की खोज कर गुरुद्वारे का निर्माण कराया था।
शहादत के उपरांत भाई जैता जी गुरु साहिब के पावन शीश को मुग़ल पहरे के बीच से उठाकर लगभग 300 किलोमीटर पैदल चलकर श्री आनंदपुर साहिब ले गए थे।
Guru Tegh Bahadur Ji
सिख धर्म से और
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