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Embroidered artwork for स्वर्णहंस और लोभी माता: सुवर्णहंस जातक: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

स्वर्णहंस और लोभी माता

सुवर्णहंस जातक

जातक क्रमांक १३६: एक दिव्य स्वर्णहंस के रूप में पुनर्जन्म लेकर बोधिसत्व अपनी पूर्वजन्म की निर्धन पत्नी और तीन पुत्रियों के पास आते हैं और उन्हें समय-समय पर एक-एक सोने का पंख देकर उनकी आजीविका चलाते हैं। किंतु लालच में अंधी होकर माता हंस को पकड़कर उसके सारे पंख एक साथ नोच लेती है। कर्म के नियम से वे पंख बगुले के पंखों में बदल जाते हैं। घाव भरने पर हंस उड़ जाता है और कभी नहीं लौटता, जो असंतोष के विनाशकारी परिणाम की शिक्षा देता है।

स्वर्ण में पुनर्जन्मित पिता

अतीत काल में, जब वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त राज्य करते थे, बोधिसत्व एक सम्मानित ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए। युवावस्था में उनका विवाह हुआ और उनके घर तीन पुत्रियों—नंदा, नंदवती और सुंदरीनंदा—ने जन्म लिया। उन्होंने एक धर्मपरायण गृहस्थ का जीवन व्यतीत किया। उनकी मृत्यु के पश्चात, उनके निष्कलंक जीवन के पुण्यों ने फल दिया: वे एक भव्य स्वर्णहंस (सुवर्णहंस) के रूप में उत्पन्न हुए, जिनके पंख शुद्ध स्वर्ण के थे और जिन्हें अपने पूर्वजन्मों का स्मरण रहता था।

दिव्य दृष्टि से आकाश से नीचे देखते हुए, स्वर्णहंस ने अपने पीछे छोड़े गए परिवार को खोजा और उन्हें घोर दरिद्रता में पाया। पति और पिता के बिना, उनकी विधवा पत्नी और तीन पुत्रियाँ दूसरों के घरों में धान कूटने और अन्न पीसने का काम करके बमुश्किल अपना पेट भर रही थीं, फटे-पुराने वस्त्रों में।

पिता की करुणा

अपने पूर्व परिवार के प्रति करुणा से हंस का हृदय भर उठा। उसने सोचा: "मेरी पत्नी और पुत्रियाँ साधनों के अभाव में गहरे कष्ट में हैं। मेरा शरीर शुद्ध स्वर्ण के पंखों से आवृत है। यदि मैं उन्हें समय-समय पर एक पंख दूँ, तो वे उसे बेचकर किसी वस्तु की कमी नहीं अनुभव करेंगी।" यह निश्चय करके वह अपने पुराने घर की ओर उड़ा और छत की मुंडेर पर जा बैठा।

उस तेजस्वी पक्षी को देखकर महिलाएँ चकित रह गईं। कोमल मानव-वाणी में हंस ने कहा: "डरो मत। मैं तुम्हारा पति और पिता हूँ, जो इस रूप में पुनर्जन्म लेकर आया हूँ।" उसने बताया कि वह उनके कष्ट को सहन न कर पाने के कारण लौटा है। उसने एक चमकीला स्वर्ण-पंख गिराया और उन्हें बाजार में बेचकर जीवन-यापन करने को कहा, तथा जब भी आवश्यकता हो, एक और पंख देकर लौट आने का वचन दिया।

अपने वचन के अनुसार, स्वर्णहंस बार-बार लौटकर आता और प्रत्येक बार एक शुद्ध स्वर्ण-पंख छोड़ जाता। इस स्थिर धन-लाभ से माता और उनकी तीन पुत्रियों ने एक सुदृढ़ घर बनवाया, उत्तम वस्त्र धारण किए, और भरपेट भोजन किया। कुछ समय के लिए परिवार का दीर्घ कष्ट समाप्त हो गया।

माता का घातक लोभ

समृद्धि ने माता को संतुष्ट नहीं किया; उसने केवल उसके लोभ को बढ़ाया। एक दिन उसने अपनी पुत्रियों से कहा कि पक्षी के मन पर विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि कौन जानता है कि उनका पिता कब किसी दूर देश को उड़ जाए और कभी न लौटे। "अगली बार जब वह आए," उसने कहा, "हम उसे पकड़ेंगे और उसके सारे पंख एक साथ ले लेंगे।" तीनों पुत्रियाँ भयभीत हो गईं। "माँ," उन्होंने विरोध किया, "उन्होंने हमें विनाश से बचाया है, और हमारे पास पहले से ही सब कुछ है जिसकी हमें आवश्यकता है। उन्हें हानि मत पहुँचाओ।"

माता ने उनकी एक न सुनी। जब स्वर्णहंस अगली बार पूर्व की भाँति विश्वासपूर्वक आँगन में उतरा, तो उसने उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया और भीतर खींच ले गई। उसने उसकी पीड़ा-भरी चीत्कारों की अवहेलना करते हुए उसके सारे पंख बलपूर्वक नोच डाले। किंतु जैसे ही हिंसा से हर एक स्वर्ण-पंख उसके शरीर से उखाड़ा गया, वह अपनी चमक खो बैठा। उसके हाथ में आए पंख अब स्वर्ण के नहीं, बल्कि बगुले के मोटे और मूल्यहीन पंखों के समान हो गए।

क्रोधित और निराश होकर, माता ने उस घायल, रक्तरंजित पक्षी को एक पुरानी अन्न-पेटी में फेंक दिया। उसकी करुणामयी पुत्रियों ने गुप्त रूप से उसके घावों की सेवा की और उसे भोजन दिया, जब तक समय के साथ नए पंख नहीं उग आए। परंतु जो पंख उगे वे साधारण श्वेत पंख थे, स्वर्ण के एक कण से भी रहित। जैसे ही उसके पंखों में उड़ने की शक्ति लौटी, हंस आकाश में उड़ गया, हिमालय की दिशा में अपना मार्ग निश्चित किया, और उस घर में फिर कभी नहीं लौटा।

बुद्ध की पहचान और शिक्षा

यह जातक क्रमांक १३६ खुद्दक निकाय की जातकत्थवण्णना में संरक्षित है, जो पालि त्रिपिटक का टीका-संग्रह है जिसमें बोधिसत्व के पूर्वजन्मों की कथाएँ संकलित हैं। भगवान बुद्ध ने यह कथा भिक्षुओं को उस समय सुनाई जब भिक्षुणी थुल्लनंदा ने एक गृहस्थ उपासक के खेत से अपने हिस्से से कहीं अधिक लहसुन ले लिया और खेत के रखवाले की यह शिकायत बुद्ध तक पहुँची कि भिक्षुणियाँ लोभी हैं। समवधान में, जो प्रत्येक जातक के समापन पर आने वाली पहचान है, उन्होंने प्रकट किया कि पुरानी कथा के पात्र कौन बने थे। उन्होंने कहा कि लोभी माता भिक्षुणी थुल्लनंदा का पूर्वजन्म थी। उन्होंने यह भी कहा कि उसकी तीनों गुणवती पुत्रियाँ थुल्लनंदा की ही तीन सहोदराओं के रूप में भिक्षुणी संघ में पुनर्जन्मी हुईं।

इस कथा के माध्यम से बुद्ध ने अपने धर्म के केंद्रीय सिद्धांतों में से एक की शिक्षा दी: संतुट्ठि, अर्थात संतोष, जिसे उन्होंने अन्यत्र मनुष्य के लिए सर्वोच्च धन घोषित किया है—संतुट्ठी परमं धनं। हंस के पंख, जो प्रेमपूर्वक स्वेच्छा से दिए गए थे, परिवार को अनंत काल तक सहारा दे सकते थे। वही पंख, जब भय और लोभ से बलपूर्वक छीने गए, छीने जाने के क्षण ही मूल्यहीन हो गए। जो कुछ हिंसा और अधीरता से लिया जाता है, यह जातक सिखाता है, वह अपना वही मूल्य खो देता है जिसके कारण उसे लेने योग्य समझा गया था।

क्या आप जानते हैं?

सुवर्णहंस जातक (क्रमांक १३६) को विश्व स्तर पर ईसप की प्रसिद्ध कहानी 'सोने का अंडा देने वाली मुर्गी/हंस' का मूल भारतीय स्रोत माना जाता है।

पाली भाषा में 'सुवर्णहंस' का अर्थ दिव्य सुनहरा हंस है, जो भारतीय परंपरा में विवेक, निर्मलता और आध्यात्मिक उड़ान का प्रतीक माना गया है।

समवधान में भगवान बुद्ध ने उस लोभी माता की पहचान भिक्षुणी थुल्लनंदा के रूप में की, जो संघ में संचय और लोभ के लिए कुख्यात थी।

यह कथा बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत 'संतुष्टि' (संतोष) का प्रतिपादन करती है, जिसे बुद्ध ने सर्वश्रेष्ठ धन (संतुट्ठी परमं धनं) घोषित किया है।

सोने के पंखों का बगुले के पंखों में बदलना यह सिद्ध करता है कि हिंसा और अन्याय से छीनी गई वस्तु अपना वास्तविक मूल्य और दिव्यता खो देती है।

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