अवलोकितेश्वर अष्टोत्तरशत नाम स्तोत्र
यह एक स्तोत्र है जिसमें करुणा के देवता अवलोकितेश्वर के 108 नामों का वर्णन है। इसे पढ़ने या गाने से भक्त को लौकिक सुख और समृद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक
ॐ, अवलोकितेश्वर को नमस्कार।
श्लोक 1
हे पद्मसत्त्व, महापद्म, लोकेश्वर और महेश्वर! हे अवलोकितेश्वर, हे धीरों में श्रेष्ठ, हे वज्रधर्म! आपको नमस्कार है।
श्लोक 2
हे धर्मराज, महाशुद्ध, सत्त्वराज और महामते! हे पद्मात्मक, महापद्म और पद्मनाथ! आपको नमस्कार है।
श्लोक 3
हे पद्मोद्भव, सुपद्माभ, पद्मशुद्ध और सुशोधक! हे वज्रपद्म, सुपद्मांक और पद्मपद्म! आपको नमस्कार है।
श्लोक 4
हे महाविश्व, महालोक, महाकाय और महोपम! हे महाधीर, महावीर और महाशौरे! आपको नमस्कार है।
श्लोक 5
हे सत्त्वों के आश्रय, महायान, महायोग और पितामह! हे शंभु, शंकर, शुद्धार्थ और बुद्धपद्म! आपको नमस्कार है।
श्लोक 6
हे धर्म, तत्त्व और अर्थ के ज्ञाता, सद्धर्म, शुद्धधर्म और सुधर्म को करने वाले! हे महाधर्म, सुधर्म में अग्रणी और धर्मचक्र! आपको नमस्कार है।
श्लोक 7
हे बुद्धसत्त्व, सुसत्त्वों में श्रेष्ठ, धर्मसत्त्व और सुसत्त्व को धारण करने वाले! हे सत्त्वोत्तम, सुसत्त्व के ज्ञाता और सत्त्वसत्त्व! आपको नमस्कार है।
श्लोक 8
हे अवलोकितेश्वर, नाथों में श्रेष्ठ और महानाथ, देखे जाने वाले! हे लोकों को प्रकाशित करने वाले, लोकों के अर्थ के ज्ञाता और लोकनाथ! आपको नमस्कार है।
श्लोक 9
हे लोकाक्षर (लोकों के स्वरूप), अक्षर महा (अविनाशी महान स्वभाव), अक्षरों में श्रेष्ठ और अक्षरों के समान! हे अक्षर और सभी अक्षरों में व्याप्त, चक्राक्षर (चक्र के समान व्यापक) ! आपको नमस्कार है।
श्लोक 10
हे पद्महस्त, महाहस्त, आश्वासन देने वाले और प्रदान करने वाले! हे बुद्ध, धर्म के ज्ञाता, महाबुद्ध और बुद्धस्वरूप! आपको नमस्कार है।
श्लोक 11
हे बुद्धरूप, महारूप, वज्ररूप और सुरूप को जानने वाले! हे धर्मालोक (धर्म का प्रकाश), सुतेज में श्रेष्ठ और लोकालोक (लोकों के प्रकाशक) ! आपको नमस्कार है।
श्लोक 12
हे पद्मश्री के नाथ, नाथों में श्रेष्ठ, धर्मश्री के नाथ और नाथवान (नाथों से युक्त)! हे ब्रह्मनाथ, महाब्रह्म और ब्रह्मपुत्र! आपको नमस्कार है।
श्लोक 13
हे दीप, दीपों में श्रेष्ठ, भयंकर दीप, दीपालोक (दीप के प्रकाश) और सुदीपक (अच्छी तरह प्रकाशित करने वाले)! हे दीपनाथ, महादीप और बुद्धदीप! आपको नमस्कार है।
श्लोक 14
हे बुद्ध द्वारा अभिषिक्त, बुद्धों में श्रेष्ठ, बुद्धपुत्र और महाबुध (अत्यंत ज्ञानी)! हे बुद्धाभिषेक द्वारा मस्तक पर मुकुट धारण करने वाले और बुद्धरूपी ज्ञान ही जिनका स्वरूप है ! आपको नमस्कार है।
श्लोक 15
हे बुद्धचक्षु (बुद्ध की दृष्टि), महाचक्षु, धर्मचक्षु और महान दृष्टि वाले! हे समाधि के ज्ञान ही जिनका सब कुछ है, हे वज्रनेत्र! आपको नमस्कार है।
श्लोक 16
इस प्रकार, सम्पूर्ण भाव से, आपके एक सौ आठ नामों का यह गौण स्तोत्र, जो कोई मनन करे या स्तुति करे, वह लोकैश्वर्य (सांसारिक ऐश्वर्य) को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 17
इस प्रकार आर्य अवलोकितेश्वर के एक सौ आठ नामों की प्रार्थना सहित स्तुति सम्पूर्ण हुई।
श्लोक 18
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र महायान बौद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण भाग है, जो करुणा के बोधिसत्व अवलोकितेश्वर को समर्पित है। इसे प्रायः भक्ति-पूजा या ध्यान के दौरान पढ़ा जाता है, और अंतिम श्लोक के अनुसार इसके पाठ से लौकिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इसकी रचना का कोई निश्चित लेखक या तिथि ज्ञात नहीं है, पर यह अवलोकितेश्वर की उपासना के व्यापक साहित्य का हिस्सा है।
क्या आप जानते हैं?
स्तोत्र का शीर्षक
यह 'अवलोकितेश्वराष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्' है, जिसमें अवलोकितेश्वर (करुणा के बोधिसत्त्व) के 108 नामों का वर्णन है। 'अष्टोत्तरशत' का अर्थ 108 (100+8) होता है, जो भारतीय परंपरा में एक पवित्र संख्या है।
रचना की शैली
पंद्रह श्लोकों में नाम गिनाए गए हैं (प्रति श्लोक लगभग सात, कुल 108) और प्रत्येक के अंत में 'नमोऽस्तु ते' (आपको नमस्कार है) कहा गया है। यह एक स्तुति-काव्य है जो पाठक को ध्यान या जप के लिए प्रेरित करता है।
नामों की विविधता
इसमें अवलोकितेश्वर को 'पद्मसत्त्व' (कमल-स्वभाव), 'वज्रधर्म' (वज्र जैसा धर्म), 'धर्मराज' (धर्म के राजा), और 'बुद्धपुत्र' (बुद्ध के पुत्र) जैसे विभिन्न गुणों से संबोधित किया गया है। यह दर्शाता है कि वे करुणा, ज्ञान और शक्ति के अनेक पहलुओं के प्रतीक हैं।
बौद्ध संदर्भ
यह स्तोत्र महायान बौद्ध परंपरा का हिस्सा है, जहाँ अवलोकितेश्वर को सभी प्राणियों के दुःख दूर करने वाला माना जाता है। 'लोकेश्वर' (जगत के ईश्वर) और 'महाकारुणिक' जैसे नाम इस करुणा पर जोर देते हैं।
फलश्रुति
अंतिम श्लोक (16वें) में कहा गया है कि इन 108 नामों का मनन या स्तवन करने से 'लोकैश्वर्य' (सांसारिक ऐश्वर्य) प्राप्त होता है। यह पाठक को आध्यात्मिक और भौतिक लाभ दोनों का आश्वासन देता है।
विशेष शब्दावली
'आर्य' (आर्य) शब्द बुद्ध या बोधिसत्त्व के लिए सम्मानसूचक है, और 'अवलोकित' का अर्थ 'देखने वाला' — यह उनके सर्वदर्शी स्वभाव की ओर इशारा करता है।
Avalokiteshvara
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