मोहिनी एकादशी व्रत कथा (वैशाख शुक्ल पक्ष)
सूर्य पुराण में वर्णित वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी की पावन कथा, जिसमें महर्षि कौण्डिन्य के उपदेश से धृष्टबुद्धि नामक पापी पुत्र के सभी घोर पाप नष्ट हो गए थे।
सूर्य पुराण से वशिष्ठ-श्रीराम संवाद
सूर्य पुराण और पद्म पुराण के अनुसार त्रेतायुग में महर्षि वशिष्ठ ने भगवान श्रीराम को मोहिनी एकादशी की पावन कथा सुनाई थी।
सीता जी की खोज के समय भगवान श्रीराम ने महर्षि वशिष्ठ से पूछा:
"हे गुरुदेव! ऐसा कौन सा उत्तम व्रत है जिसके प्रभाव से समस्त दुःखों और पापों का नाश हो तथा चित्त को परम शांति मिले?"
महर्षि वशिष्ठ ने कहा:
"हे राम! वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का व्रत संसार के सभी मोह-जाल और पापों को नष्ट करने वाला है। इसके प्रभाव से मनुष्य जन्म-जन्मान्तर के पापकर्मों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।"
पाठ देखने के इच्छुक पाठकों के लिए: पद्म पुराण के उत्तरखण्ड (समापन खण्ड) में, एन. ए. देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद की अध्याय-संख्या के अनुसार, यह एकादशी अध्याय 49 में कही गई है, जहाँ वशिष्ठ राम को उत्तर देते हुए वणिक-पुत्र धृष्टबुद्धि और ऋषि कौण्डिन्य की कथा कहते हैं। संस्करणों और अनुवादों में अध्याय-संख्या भिन्न हो सकती है, इसलिए इसे केवल उस अनुवाद के लिए मार्गदर्शक मानें।
वैश्य धनपाल और धृष्टबुद्धि की कथा
सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक सुन्दर नगरी थी। वहाँ धनपाल नाम का एक परम धार्मिक और दानी वैश्य रहता था। वह भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था और सदा धर्मशालाएं, कुएं और अन्न-सत्र चलाता था।
धनपाल के पाँच पुत्र थे: सुमना, द्युतिमान, मेधावी, सुकृति और सबसे छोटा धृष्टबुद्धि।
धृष्टबुद्धि अत्यन्त दुराचारी, जुआरी और मद्यपान करने वाला निकला। उसने पिता के धन को वेश्याओं और कुसंगति में उड़ा दिया तथा माता-पिता और विद्वानों का अपमान किया।
जब वह किसी प्रकार नहीं सुधरा, तो पिता और भाइयों ने दुखी होकर उसे घर से निकाल दिया।
महर्षि कौण्डिन्य का आश्रम और उद्धार
कुसंगतियों ने उसका बचा-खुचा धन भी छीन लिया। धृष्टबुद्धि भूख-प्यास से व्याकुल होकर वनों में भटकने लगा और डाके डालने लगा।
वैशाख मास में भटकते-भटकते वह गंगा तट पर महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम पहुँच गया। महर्षि अभी-अभी गंगा स्नान करके निकले थे। उनके भीगे वस्त्रों से पवित्र गंगाजल की कुछ बूँदें धृष्टबुद्धि पर गिर पड़ीं।
पवित्र जल के स्पर्श से उसके हृदय का अज्ञान नष्ट हो गया और उसे अपने पापों का घोर पश्चाताप हुआ। वह महर्षि कौण्डिन्य के चरणों में गिरकर रोने लगा:
"हे मुनिवर! मैंने जीवन भर घोर पाप किए हैं। कृपा कर मुझे कोई ऐसा प्रायश्चित बताइए जिससे मैं नरक की आग से बच सकूँ!"
मोहिनी एकादशी का वरदान
महर्षि कौण्डिन्य ने दयापूर्वक कहा:
"हे वत्स! वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का पूर्ण श्रद्धा से व्रत करो। यह व्रत सुमेरु पर्वत जैसे विशाल पापों को भी वैसे ही भस्म कर देता है जैसे अग्नि रुई के ढेर को जला देती है।"
धृष्टबुद्धि ने विधिपूर्वक मोहिनी एकादशी का निर्जल व्रत रखा और भगवान विष्णु की आराधना की। व्रत के प्रभाव से उसके समस्त पाप नष्ट हो गए।
द्वादशी के दिन उसे दिव्य देह प्राप्त हुई और वह दिव्य पुष्पक विमान पर बैठकर भगवान विष्णु के परम धाम वैकुण्ठ को प्रस्थान कर गया।
पूजन एवं व्रत विधि
- 1.मोह का नाश: यह व्रत सांसारिक मोह-माया और दुर्व्यसनों से मुक्ति दिलाता है।
- 2.श्रीहरि पूजन: भगवान विष्णु के 'मोहिनी' स्वरूप का ध्यान कर चन्दन, धूप, दीप और तुलसी दल अर्पित करें।
- 3.रात्रि जागरण: रात्रि में जागरण कर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- 4.पारण: द्वादशी के दिन प्रातः स्नान और दान के पश्चात व्रत खोलें।
संकल्प और व्रत के समय का महत्व
धृष्टबुद्धि का व्रत तभी फलदायी हो सका जब महर्षि कौण्डिन्य ने उसे पहले संकल्प लेने का निर्देश दिया, अर्थात् प्रातःकाल भगवान विष्णु के समक्ष मोहिनी एकादशी का नाम लेकर व्रत और उसके पश्चात् होने वाले पारण को बिना त्रुटि पूर्ण करने की औपचारिक प्रतिज्ञा। आज जो भी भक्त यह एकादशी रखता है, उसे भी इसी प्रकार आरम्भ करना सिखाया जाता है: संकल्प ही भूख के एक दिन को समर्पण में बदल देता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने एक त्यागे हुए पापी की विवश प्रतिज्ञा को वैकुण्ठ के मार्ग में बदल दिया था।
व्रत में सूर्योदय से सूर्योदय तक अन्न का त्याग आवश्यक है, जो स्वास्थ्य अनुमति दे उनके लिए निर्जल व्रत का कठोर नियम है, और बाकियों के लिए फल या दूध की छूट है। भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की पूजा प्रातःकाल चन्दन, धूप और तुलसी दल से की जाती है और संध्या में पुनः की जाती है, जब परिवार रातभर जागकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करता है, जो धृष्टबुद्धि की उस रात्रि को प्रतिध्वनित करता है जब वह सोने के बदले रोता हुआ प्रार्थना में लीन रहा था।
व्रत का पारण: द्वादशी पर उपवास समाप्ति
व्रत की समाप्ति द्वादशी की प्रातः, पंचांग द्वारा निर्धारित समय में पारण से होती है। भक्त स्नान करके ब्राह्मणों और जरूरतमन्दों को दान देते हैं और तभी अपना पहला आहार लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे धृष्टबुद्धि का रूपान्तरण उसकी निरन्तर पश्चाताप भरी रात्रि के बाद द्वादशी की प्रातः ही पूर्ण हुआ था।
आध्यात्मिक शिक्षा
मोहिनी एकादशी की शिक्षा पूरी तरह इस बात पर निर्भर है कि महर्षि कौण्डिन्य का जल स्पर्श होने से पहले धृष्टबुद्धि कौन था: न राजा, न ऋषि, बल्कि वह व्यक्ति जिसने अपने पिता के पुण्य से मिला हर अवसर नष्ट कर दिया था। वशिष्ठ श्रीराम को बताते हैं कि इस व्रत को यह शक्ति इसलिए दी गई है कि कोई भी पाप इतना बड़ा न माना जाए कि यह उसे भस्म न कर सके, बशर्ते भक्त इसके पास धृष्टबुद्धि की भाँति सच्चे आँसुओं और सम्पूर्ण समर्पण के साथ आए, न कि केवल औपचारिकता के साथ।
क्या आप जानते हैं?
वैशाख शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली मोहिनी एकादशी सांसारिक मोह-माया के बन्धनों को काटती है।
त्रेतायुग में महर्षि वशिष्ठ ने सीता खोज के समय भगवान श्रीराम को यह पावन कथा सुनाई थी।
महर्षि कौण्डिन्य के उपदेश से पापी धृष्टबुद्धि के सुमेरु पर्वत जैसे विशाल पाप भस्म हो गए थे।
समुद्र मन्थन के समय भगवान विष्णु द्वारा धारण किए गए दिव्य 'मोहिनी' स्वरूप का स्मरण इस दिन किया जाता है।
पीठासीन स्वरूप एवं पारण
यह व्रत भगवान मोहिनी स्वरूप विष्णु को समर्पित है; इसका पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के पश्चात तथा हरि वासर समाप्त होने के बाद ही सात्विक रूप से किया जाता है।
Vishnu
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संबंधित शिक्षाएं
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