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Embroidered artwork for महाधर्मपाल जातक: वह कुल जहाँ अकाल मृत्यु नहीं होती: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

महाधर्मपाल जातक

वह कुल जहाँ अकाल मृत्यु नहीं होती

तक्षशिला में शिष्य धर्मपालकुमार सहपाठी की मृत्यु पर नहीं रोता, तो आचार्य उसके पिता महाधर्मपाल के इस दावे की परीक्षा लेने गांव जाते हैं कि उनके कुल में कोई युवावस्था में नहीं मरता।

वह समाचार जिसे पिता ने मानने से इनकार कर दिया

भगवान बुद्ध ने यह जातक-कथा जेतवन में अपने पिता राजा शुद्धोदन के विषय में सुनाई थी। बोधिप्राप्ति से पूर्व, जब बुद्ध उरुवेला में कठोर तपस्या (दुष्करचर्या) कर रहे थे और उनके अन्न-त्याग की बात फैल गई थी, तो कुछ देवताओं ने कपिलवस्तु पहुंचकर राजा शुद्धोदन को बताया कि उनके पुत्र की भूख से मृत्यु हो गई है। राजा ने इसे मानने से स्पष्ट इनकार कर दिया और कहा कि उनके पुत्र की मृत्यु बोधिवृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त किए बिना कदापि नहीं हो सकती — और ऐसा ही हुआ। अपने भिक्षुओं को यह दिखाने के लिए कि यह पहला अवसर नहीं था जब उनके पिता ने मृत्यु के झूठे समाचार के समक्ष ऐसा अडिग विश्वास दिखाया हो, बुद्ध ने एक पूर्वजन्म की यह कथा सुनाई, जो त्रिपिटक के दसकनिपात में जातक संख्या ४४७ के रूप में संरक्षित है।

वह कुल जिसे शील के कारण नाम मिला

काशी राज्य में धर्मपाल नामक एक गांव था, जिसका नाम उसके मुखिया, एक ब्राह्मण गृहस्थ के नाम पर पड़ा था, जो दस कुशल कर्मपथों के पालन में इतने प्रसिद्ध थे कि उन्हें महाधर्मपाल — अर्थात 'ज्येष्ठ धर्मपाल' — कहकर सम्मानित किया जाता था, ताकि उन्हें उनके अपने पुत्र से अलग पहचाना जा सके, जो उसी नाम का था और धर्मपालकुमार — अर्थात 'कनिष्ठ धर्मपाल' — कहलाता था। पिता और पुत्र इस प्रकार एक ही नाम साझा करने वाले दो भिन्न व्यक्ति थे: गृहस्थ महाधर्मपाल, और उनका पुत्र बोधिसत्व धर्मपालकुमार।

जब बालक सोलह वर्ष का हुआ, तो महाधर्मपाल ने उसे समस्त विद्याओं में पारंगत होने के लिए प्रसिद्ध तक्षशिला विश्वविद्यालय भेजा, जहां वह एक सुविख्यात आचार्य के अधीन अध्ययन करने लगा। धर्मपालकुमार अपनी असाधारण मेधा के साथ-साथ शील, विनय और करुणा में भी श्रेष्ठ था, और शीघ्र ही आचार्य के पांच सौ शिष्यों में प्रधान बन गया।

आचार्य के पुत्र की मृत्यु, और एक शिष्य जो नहीं रोया

एक दिन आचार्य के अपने पुत्र का देहांत हो गया। पूरा गुरुकुल शोक में डूब गया; शिष्य और परिजन छाती पीट-पीटकर विलाप करने लगे। किंतु धर्मपालकुमार शांत खड़ा रहा और उसने एक भी अश्रु नहीं बहाया। जब सहपाठियों ने उसकी इस शांति पर प्रश्न उठाया, तो उसने सहजता से उत्तर दिया: 'सभी संस्कार अनित्य हैं, फिर भी किसी का युवावस्था में मरना वास्तव में असामान्य है। हमारे कुल में, अविच्छिन्न पीढ़ियों से, कोई भी युवावस्था में नहीं मरा — सभी पूर्ण, परिपक्व वृद्धावस्था प्राप्त करके ही देह त्यागते हैं।'

आचार्य इस दावे की परीक्षा लेने निकलते हैं

जब यह बात आचार्य तक पहुंची, तो वे चकित रह गए: 'यदि संसार में ऐसा कोई कुल है जहां मृत्यु कभी युवाओं को नहीं छूती, तो यह आकाश के नीचे सबसे दुर्लभ आश्चर्य है। मुझे स्वयं जाकर इसकी परीक्षा लेनी चाहिए।' उन्होंने एक जंगली बकरे की सूखी हड्डियां धुलवाईं, सुगंधित द्रव्यों से सजाकर श्वेत वस्त्र में लपेटा, उन्हें एक सुंदर मंजूषा में रखा, और एक सेवक के साथ धर्मपाल गांव की ओर प्रस्थान किया।

महाधर्मपाल ने आचार्य का पूर्ण सत्कार-सम्मान सहित स्वागत किया। भोजन के पश्चात आचार्य ने बनावटी आंसू पोंछते हुए गंभीर स्वर में कहा: 'हे गृहस्थ! आपका पुत्र धर्मपाल तक्षशिला का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी था, किंतु एक असाध्य रोग ने उसे घेर लिया और वह मेरी गोद में ही चल बसा। इस मंजूषा में उसकी अस्थियां हैं, जो मैं अंतिम संस्कार हेतु आपके पास लाया हूं।'

महाधर्मपाल की अडिग हंसी

महाधर्मपाल नहीं रोए। इसके विपरीत उन्होंने ताली बजाई और खुलकर हंस पड़े। 'हे आदरणीय आचार्य,' उन्होंने कहा, 'ये अस्थियां मेरे पुत्र की नहीं हैं — ये किसी बकरे, श्वान या अन्य प्राणी की हो सकती हैं, पर कदापि धर्मपाल की नहीं। हमारे कुल में सात पीढ़ियों से कोई युवावस्था में नहीं मरा, और मेरा पुत्र इसका पहला उदाहरण नहीं बनेगा।'

इस अडिग विश्वास से चकित होकर आचार्य ने पूछा कि ऐसा कौन-सा मंत्र या रहस्य है जो उनके कुल के युवाओं को मृत्यु से बचाता है। महाधर्मपाल ने उन्हीं गाथाओं में उत्तर दिया जो इस जातक को अपना नाम देती हैं: 'हम कोई जादू-टोना या तंत्र-मंत्र नहीं करते। हम केवल धर्म के मार्ग पर चलते हैं। हम प्राणहत्या नहीं करते, जो दिया न गया वह नहीं लेते, असत्य नहीं बोलते, काम-मिथ्याचार से दूर रहते हैं, और मदिरापान नहीं करते जो चित्त को मलिन करता है। हम दीनों को दान देते हैं, श्रमणों का सम्मान करते हैं, माता-पिता की सेवा करते हैं, और सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखते हैं — यहां तक कि हमारे सेवक और श्रमिक भी हमारे साथ इन्हीं पंचशीलों का पालन करते हैं। इसलिए धर्म हमारी रक्षा करता है, जैसे विशाल छत्र वर्षा से बचाता है। कहा गया है: धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं — अर्थात धर्माचरण करने वाले की रक्षा स्वयं धर्म करता है।'

आचार्य की स्वीकारोक्ति, और जन्मों की पहचान

श्रद्धा से अभिभूत होकर आचार्य ने महाधर्मपाल के सम्मुख झुककर प्रणाम किया, मंजूषा खोलकर बकरे की हड्डियां दिखाईं, और स्वीकार किया कि यह केवल एक परीक्षा थी। वे यह जानकर आनंदित हुए कि धर्मपालकुमार जीवित और कुशल है, और तक्षशिला लौटकर अपने समस्त शिष्यों को शील की रक्षक शक्ति की शिक्षा दी।

जेतवन में यह कथा समाप्त करते हुए बुद्ध ने जन्मों की पहचान बताई: जिस पिता का विश्वास कभी नहीं डिगा, वह महाधर्मपाल, राजा शुद्धोदन ही थे; आचार्य सारिपुत्त थे; और जो पुत्र नहीं रोया, वह धर्मपालकुमार स्वयं तथागत बुद्ध थे। यह धर्मोपदेश सुनकर राजा शुद्धोदन अनागामी फल में प्रतिष्ठित हुए।

क्या आप जानते हैं?

बुद्ध ने यह जातक अपने ही जीवन की एक घटना समझाने हेतु सुनाया: उरुवेला में छह वर्षों की कठोर तपस्या के दौरान, देवताओं ने राजा शुद्धोदन को झूठा समाचार दिया कि उनके पुत्र की भूख से मृत्यु हो गई है, किंतु शुद्धोदन ने इसे मानने से इनकार कर दिया — ठीक इस प्राचीन कथा के पिता की भांति।

कथा में पिता और पुत्र एक ही नाम साझा करते हैं

पिता महाधर्मपाल ('ज्येष्ठ धर्मपाल') हैं, और पुत्र, स्वयं बोधिसत्व, धर्मपालकुमार ('कनिष्ठ धर्मपाल') है — ये दो भिन्न व्यक्ति हैं, न कि एक ही व्यक्ति के दो नाम।

महाधर्मपाल जातक प्रसिद्ध त्रिपिटक सूक्ति धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं (धर्म सदा धर्मचारी की रक्षा करता है) का मूल शास्त्रीय आधार है।

यह कथा दर्शाती है कि पंचशील का निष्ठापूर्वक पालन — घर के सेवकों सहित — एक ऐसा आध्यात्मिक सुरक्षा कवच बनाता है जो संपूर्ण कुल को अकाल मृत्यु से बचाता है।

इस उपदेश के अंत में राजा शुद्धोदन अनागामी फल में प्रतिष्ठित हुए।

तथागत बुद्ध ने बताया कि पिता महाधर्मपाल राजा शुद्धोदन थे, आचार्य सारिपुत्र थे, और पुत्र धर्मपालकुमार पूर्वजन्म में स्वयं भगवान बुद्ध थे।

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