कल्याणमन्दिरस्तोत्र
जिनेन्द्र की स्तुति में मंगलमय स्तोत्र
यह एक जैन स्तोत्र है जो भगवान जिनेन्द्र (जिन) की महिमा का गान करता है। इसमें बताया गया है कि उनके नाम का स्मरण और उनके चरणों की भक्ति कैसे जीवन के सभी कष्टों को दूर करके मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) प्रदान करती है।
श्लोक
यह कल्याणमन्दिर स्तोत्र है। सिद्धों को नमस्कार।
श्लोक 1
जिनकी कांति चन्द्रमा में समाई हुई है, जो मेघों के आवरण से रहित हैं, और जो मंगलमय गुणों का उत्सव हैं, वही ब्रह्म हमारे और अन्यों के लिए निर्मल तत्त्व के रूप में प्रथम जिनेन्द्र के रूप में प्रकट होते हैं।
श्लोक 2
हे प्रभो! संसार रूपी भयानक वन में भटकते हुए और भव-पवन के मार्ग पर तापों से पीड़ित प्राणियों के लिए, आपके चरणकमलों की रज का वह कण समूह भव-व्यसनों की औषधि और मंगलदायक हो।
श्लोक 3
भक्त देवताओं द्वारा सेवित, मुनीन्द्रों द्वारा पूजित, प्रसिद्ध प्रभाव वाले, भक्तिपूर्ण मन से आपके द्वारा रचित, जिनेन्द्र को मैं निरंतर नमन करता हूँ, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 4
समुद्र में उठती प्रचंड तरंगों, भँवरों और भयानक मकरों से भयभीत प्राणियों के लिए, आपके नाम-मंत्र का चिंतन करने वाले जनों का वह आलम्बन बनता है, जो भव-दुःखों को हरने वाला है।
श्लोक 5
जिनके ऊँचे फणों पर मणियाँ चमक रही हैं, ऐसे सर्प के भयंकर विष में डूबी हुई दशा को प्राप्त लोगों के लिए, आपके नाम का कीर्तन करने से वह विष, सुवर्ण और दिव्य रत्नों की छाया-समूह से शांत होकर शीघ्र ही शमित हो जाता है।
श्लोक 6
बड़े-बड़े हाथियों की भयानक सेना को कुचलने वाले, सभी दिशाओं में युद्ध-धूम से व्याप्त संग्राम में, आपके चरणकमल युगल का मन से स्मरण करने वाले विजयी जनों को तत्काल विजय प्राप्त होती है।
श्लोक 7
पागल हाथियों, गजेन्द्रों और घोड़ों से युक्त संग्रामभूमि में पराजित होते हुए भी, जो आपके चरणकमल युगल का मन से स्मरण करते हैं, वे शत्रुओं का वध करके चिरकाल तक विजय प्राप्त करते हैं।
श्लोक 8
जब घोर अंधकार और दुर्निवार अग्नि के समय पृथ्वी के जलते हुए उदर में, आपके नाम का कीर्तन करने में तत्पर पुरुष निर्वाण रूपी शीतल पद को प्राप्त करते हैं, जो अप्रमेय है।
श्लोक 9
मुकुट में बंधे अर्धचंद्र के चूर्ण के समान कांति वाले, सुंदर मणियों से विभूषित पाद-आभूषणों से युक्त, वन्दक समूहों द्वारा नमित चरणों वाले, हे मुनीन्द्र! वे आपके गुणगणों की स्तुति करते हैं, पृथ्वी पर मुक्ति के लिए।
श्लोक 10
हे प्रभो! आपके चरणकमल युगल को नमन करने वाले देवताओं के मुकुटों में खिले कमलों के भीतर से निकलने वाले भृंगों के साथ, आपकी कीर्ति गाई जाती है, और आपके चरणकमल की नित्य सेवा होती है।
श्लोक 11
धीरे-धीरे चलने वाले चरणों वाले, भ्रमर-पंक्तियों से सुशोभित मणिहारों की शोभा से युक्त, आपके चरणकमल युगल का मन से स्मरण करने वाले सज्जन संसार रूपी समुद्र को आसानी से पार कर जाते हैं।
श्लोक 12
आपके चरणकमल युगल को नमन करने वाले मनुष्यों के लिए मंगल कोटि के समूहों में क्या दुर्लभ है? जिसके स्मरण मात्र से जन्म-मरण आदि सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 13
हे देव! आपके चरणकमल युगल का परिभ्रमण करने वाले भृंग को भक्त क्या नहीं कहता? क्या वह मुक्ति मार्ग में स्वर्ग को प्राप्त नहीं करता, और चामर, वायु तथा समुद्र के स्वामी को भी प्राप्त नहीं करता?
श्लोक 14
हे देव! धीरे-धीरे चलने वाले, आपके चरणकमल युगल को हृदय में धारण करने वाले का क्या नहीं होता? उसके पापराशि तुरंत इस पृथ्वी पर नष्ट हो जाते हैं, जैसे समुद्र में जलधाराएँ जल में विलीन हो जाती हैं।
श्लोक 15
जिनके नाम का जप करने से जनों का कर्ममल भी संसार-बंधन का कारण नहीं रहता, मुनि उनके गुणगणों का गान करते हैं, और वे भव-अंत को प्राप्त करके परम अप्रमेय पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 16
हे प्रभो! जन्म-जरा के भय को नष्ट करने वाला, आपके नाम का मंत्र, जो देवों और असुरों द्वारा पूजित है, उसका निरंतर मन से स्मरण करने वालों का संसार-दुःख तुरंत नष्ट हो जाता है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 17
जब अग्नि के कणों से जलते वन के प्रांत में, संसार रूपी भयानक वन में भटकने वाले प्राणियों के लिए, आपके नाम के कीर्तन में रत पुरुष निर्वाण रूपी शीतल पद को प्राप्त करते हैं, जो अप्रमेय है।
श्लोक 18
इंद्र के वज्र के समान, बिजली के समान, देवराज के समान नील कांति से युक्त, सुंदर मणियों से विभूषित पाद-आभूषणों वाले, वन्दक समूहों द्वारा नमित चरणों वाले, हे मुनीन्द्र! वे आपके गुणगणों की स्तुति करते हैं, पृथ्वी पर मुक्ति के लिए।
श्लोक 19
उन समुद्र में निवास करने वालों के जन्म का क्या फल, जिन्होंने समुद्र का जल, सुवर्ण और रत्न प्राप्त किए? जो आपके चरणों में एकनिष्ठ हैं, वे पृथ्वी पर मुक्ति के भागी होते हैं, और वे आपके गुणगणों का गान करते हैं, मुक्ति के लिए।
श्लोक 20
उन मंगल कोटि समूहों वाले जन्म का क्या फल, जिनके नाम से संसार-बंधन नहीं होता? मुनि उनके गुणगणों का गान करते हैं, और वे भव-अंत को प्राप्त करके परम अप्रमेय पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 21
उस विमल पुरुष के पाप का क्या लेखा-जोखा? संसार रूपी भयानक वन में भटकने वाले प्राणियों के लिए, आपके नाम के कीर्तन में रत पुरुष निर्वाण रूपी शीतल पद को प्राप्त करते हैं, जो अप्रमेय है।
श्लोक 22
उसके सैकड़ों मंगलों से, शांत किए गए समस्त देव समूहों की आराधना से और किए गए प्रसादों से क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 23
उन मनुष्यों के जन्म का क्या फल, जिनके हृदय में आपके मंद-मंद गति वाले, भ्रमर-पंक्तियों से सुशोभित मणिमालाओं की शोभा से युक्त चरणकमल, मोह को नष्ट करके चमकते नहीं?
श्लोक 24
उसके द्वारा किए गए सारे दान, या नियम-संयम और पंचतप से क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 25
उसके द्वारा अप्रमेय तीर्थों की सेवा का, या पृथ्वी पर भूतनाथों द्वारा किए गए कार्यों का क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी मंगलमयी कथा स्थित है, जो संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 26
उसके द्वारा किए गए करोड़ों मंत्रजपों से, या दुष्कर तपों के करोड़ों से क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 27
उसके दान, यज्ञ, सुतप्त तपों से, या सैकड़ों तीर्थ सेवनों से किए गए समस्त कर्मों का क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 28
उसके द्वारा मंदमति लोगों द्वारा इस लोक में किए गए कार्यों से, या सुचरित और सुकृतों से किए गए समस्त कर्मों का क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 29
उसके सैकड़ों मंगलों से, शांत किए गए समस्त देव समूहों की आराधना से और किए गए प्रसादों से क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 30
उन मनुष्यों के जन्म का क्या फल, जिनके हृदय में आपके मंद-मंद गति वाले, भ्रमर-पंक्तियों से सुशोभित मणिमालाओं की शोभा से युक्त चरणकमल, मोह को नष्ट करके चमकते नहीं?
श्लोक 31
उसके द्वारा किए गए सारे दान, या नियम-संयम और पंचतप से क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 32
उसके द्वारा अप्रमेय तीर्थों की सेवा का, या पृथ्वी पर भूतनाथों द्वारा किए गए कार्यों का क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी मंगलमयी कथा स्थित है, जो संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 33
उसके द्वारा किए गए करोड़ों मंत्रजपों से, या दुष्कर तपों के करोड़ों से क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 34
उसके दान, यज्ञ, सुतप्त तपों से, या सैकड़ों तीर्थ सेवनों से किए गए समस्त कर्मों का क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 35
उसके द्वारा मंदमति लोगों द्वारा इस लोक में किए गए कार्यों से, या सुचरित और सुकृतों से किए गए समस्त कर्मों का क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 36
उसके सैकड़ों मंगलों से, शांत किए गए समस्त देव समूहों की आराधना से और किए गए प्रसादों से क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 37
उन मनुष्यों के जन्म का क्या फल, जिनके हृदय में आपके मंद-मंद गति वाले, भ्रमर-पंक्तियों से सुशोभित मणिमालाओं की शोभा से युक्त चरणकमल, मोह को नष्ट करके चमकते नहीं?
श्लोक 38
उसके द्वारा किए गए सारे दान, या नियम-संयम और पंचतप से क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 39
उसके द्वारा अप्रमेय तीर्थों की सेवा का, या पृथ्वी पर भूतनाथों द्वारा किए गए कार्यों का क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी मंगलमयी कथा स्थित है, जो संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 40
उसके द्वारा किए गए करोड़ों मंत्रजपों से, या दुष्कर तपों के करोड़ों से क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 41
उसके दान, यज्ञ, सुतप्त तपों से, या सैकड़ों तीर्थ सेवनों से किए गए समस्त कर्मों का क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 42
उसके द्वारा मंदमति लोगों द्वारा इस लोक में किए गए कार्यों से, या सुचरित और सुकृतों से किए गए समस्त कर्मों का क्या लाभ, जिसके हृदय में आपकी कथा स्थित है, जो मंगलमयी है और संसार से तारने वाली है, भव-ताप की शांति के लिए।
श्लोक 43
इस प्रकार श्री सिद्धसेन दिवाकर सूरि द्वारा रचित कल्याणमन्दिर स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
श्लोक 44
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र जैन धर्म की एक प्रसिद्ध रचना है, जिसे 'कल्याणमन्दिरस्तोत्र' कहा जाता है। इसकी रचना परंपरागत रूप से आचार्य सिद्धसेन दिवाकर को मानी जाती है, जो जैन दर्शन के एक महान विद्वान थे। यह स्तोत्र जिन (जिनेन्द्र) की स्तुति में है, जिन्हें जैन धर्म में मोक्ष के मार्ग के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। इसका पाठ प्रायः सुबह-शाम ध्यान या प्रार्थना के समय किया जाता है, और यह भक्तों को शांति और आध्यात्मिक बल देने के लिए जाना जाता है। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त जीवन के दुखों से मुक्ति और मंगल की कामना करते हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Acharya Kumudachandra
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क्या आप जानते हैं?
रचयिता
यह स्तोत्र जैन आचार्य सिद्धसेन दिवाकर सूरि द्वारा रचित है, जो पाँचवीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध जैन दार्शनिक और कवि थे। उन्होंने 'सन्मतितर्क' जैसे दार्शनिक ग्रंथ भी लिखे।
रचना का स्वरूप
'कल्याणमन्दिरस्तोत्र' में 42 श्लोक हैं, जो संस्कृत के एक विशेष छंद (वसंततिलका) में रचे गए हैं। इसमें बार-बार जिन (तीर्थंकर) के चरणकमलों और नाम की महिमा का गुणगान किया गया है।
विषय-वस्तु
स्तोत्र में संसार के कष्टों—जैसे युद्ध, साँप का जहर, आग, अंधकार—का वर्णन करते हुए बताया गया है कि केवल जिनेंद्र के नाम का स्मरण ही इन सबसे रक्षा कर सकता है। हर श्लोक में इसी शक्ति का वर्णन है।
भक्ति का महत्व
यह स्तोत्र इस बात पर जोर देता है कि जिनेंद्र के चरणों में श्रद्धा और मात्र नाम-जप ही सभी पापों और कर्मों को नष्ट करके मोक्ष प्रदान कर सकता है, बिना किसी जटिल अनुष्ठान के।
प्रभाव
यह स्तोत्र जैन धर्म में अत्यंत लोकप्रिय है और इसे सुख-शांति के लिए नियमित रूप से पढ़ा जाता है। इसे 'कल्याणमन्दिर' (कल्याण का मंदिर) कहा गया है, क्योंकि यह सभी कल्याणों का स्रोत माना जाता है।
