पार्श्वनाथ चालीसा
यह पार्श्वनाथ चालीसा भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति और उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं का वर्णन करने वाली एक भक्ति रचना है, जिसे पाठ करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
श्लोक
सिर झुकाकर चरणों में, तीनों कालों में वंदन करता हूँ। पार्श्वनाथ भगवान का स्मरण करता हूँ जो कृपालु हैं।
श्लोक 1
अश्वसेन के लाड़ले, वामा के पुत्र, सुखकारी, वाराणसी के राजा थे, जगत को तारने वाले अवतार।
श्लोक 2
जय पार्श्वनाथ प्रभु, सुख देने वाले, जगत के संकटों को हरने वाले।
श्लोक 3
वाराणसी नगरी अत्यंत पवित्र है, जहाँ जगत के मनभावन (पार्श्वनाथ) का जन्म हुआ।
श्लोक 4
पौष कृष्ण ग्यारस का दिन था, इंद्र देव और सब देवता आनंदित थे।
श्लोक 5
कमठ का जीव पूर्व का वैरी था, उसने विकराल पाषाण रूप धारण किया था।
श्लोक 6
जब प्रभु को तप करते हुए पाया, तो मूसलधार जल बरसाया।
श्लोक 7
बिजली कड़की, बादल गरजे, विकराल रूप धारण कर देवता घबरा गए।
श्लोक 8
प्रभु जी जरा भी विचलित नहीं हुए, ध्यान में लीन रहे, सब सुखों से परे।
श्लोक 9
धरणेन्द्र और पद्मावती दौड़े आए, फण का छत्र प्रभु के सिर पर सजाया।
श्लोक 10
कमठ हारकर प्रभु के चरणों में आया, क्षमा माँगकर अपने पापों को नष्ट किया।
श्लोक 11
केवलज्ञान हुआ, सुखदाता, समवशरण में ज्ञान के विधाता।
श्लोक 12
सम्मेद शिखर से मुक्ति प्राप्त की, मुक्ति धाम का रास्ता दिखाया।
श्लोक 13
जो मनुष्य पार्श्व चालीसा गाता है, वह सब संकटों से मुक्ति पाता है।
श्लोक 14
भूत-पिशाच निकट नहीं आते, जो पार्श्वनाथ का नाम सुनाता है।
श्लोक 15
विषधर का विष उतर जाता है, पार्श्व नाम की महिमा गाई जाती है।
श्लोक 16
संतानहीन को पुत्र मिल जाता है, निर्धन को धन-दौलत और सुख मिलता है।
श्लोक 17
रोग, शोक, सब व्याधियाँ नष्ट होती हैं, कंचन देह और सुयश जग में मिलता है।
श्लोक 18
सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले, तीनों लोकों के भाग्य विधाता।
श्लोक 19
चालीस दिन जो पाठ करता है, वह मनुष्य मनचाहा फल पाता है।
श्लोक 20
जय पार्श्वनाथ, जय सुखदाता, जय तीनों लोकों के पिता-माता।
श्लोक 21
अपने दास को चरणों की शरण दीजिए, भवसागर से पार कीजिए।
श्लोक 22
नमो नमो पारस प्रभु, हमारे संकट हरिए। हाथ जोड़कर विनती करता हूँ, भव से पार उतारिए।
श्लोक 23
जय हो, जय हो पार्श्व दयालु, संकट हरिए और कल्याण कीजिए।
श्लोक 24
चार पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) ज्ञानी को प्राप्त होते हैं, पार्श्वनाथ की अमृत वाणी से।
श्लोक 25
अहिंसा, सत्य, अचौर्य (अस्तेय) सिखाया, त्याग धर्म का पाठ पढ़ाया।
श्लोक 26
सब संघ पर कृपा कीजिए, जैन धर्म का जयकारा दीजिए।
श्लोक 27
जय जय जय पारस भगवान, देवों, मनुष्यों, मुनियों द्वारा पूजित।
श्लोक 28
दीनबंधु, दुखहर्ता स्वामी, अंतर्यामी, रक्षा कीजिए।
श्लोक 29
जो इस चालीसा का नित्य ध्यान करता है, वह निश्चय ही निर्वाण पाता है।
श्लोक 30
पार्श्वनाथ प्रभु की जय बोलो, अपने मन के सब पट खोलो।
श्लोक 31
जय हो, जय हो पार्श्व जिनराज, सब मनोरथ सिद्ध करने वाले।
श्लोक 32
पार्श्व चालीसा जो पढ़ता है, मन में भक्ति धारण करके, सब अमंगल दूर होते हैं, अपार सुख पाता है।
श्लोक 33
सम्मेद शिखर के नाथ प्रभु, पारसनाथ कृपालु, शरण में पड़े की लाज रखिए, नाथ जी निहाल कीजिए।
श्लोक 34
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह पार्श्वनाथ चालीसा जैन धर्म की एक लोकप्रिय भक्ति रचना है, जो तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है। परंपरागत रूप से इसे प्रतिदिन या विशेष अवसरों पर पाठ किया जाता है, विशेषकर संकटों से मुक्ति, मनोकामना पूर्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए। यह चालीसा भक्तों द्वारा श्रद्धापूर्वक गाई जाती है और इसके नियमित पाठ से जीवन में सुख, शांति और निर्वाण की प्राप्ति का विश्वास किया जाता है।
क्या आप जानते हैं?
जन्म और माता-पिता
भगवान पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी (काशी) नगरी में हुआ था। उनके पिता का नाम राजा अश्वसेन और माता का नाम रानी वामा था। यह घटना पौष मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारस (एकादशी) तिथि को घटित हुई, जब इंद्र देव तक आनंदित हुए।
कमठ का प्रतिशोध और परीक्षा
पूर्व जन्म में कमठ नामक शत्रु ने पार्श्वनाथ से वैर रखा और इस जन्म में विकराल पाषाण (सर्प) का रूप धारण कर लिया। जब भगवान तपस्या में लीन थे, तब कमठ ने मूसलधार वर्षा, बिजली और गर्जना से उन्हें विचलित करने का प्रयास किया, पर प्रभु अडोल रहे।
धरणेन्द्र और पद्मावती का संरक्षण
तपस्या के दौरान सर्पराज धरणेन्द्र और उनकी पत्नी पद्मावती ने अपने विशाल फनों को छत्र के समान प्रभु के शीश पर सजाकर उनकी रक्षा की। यह दृश्य भगवान की अटल शक्ति और दिव्य सुरक्षा का प्रतीक है।
क्षमा और केवलज्ञान
पराजित होने पर कमठ ने प्रभु के चरणों में आकर क्षमा मांगी और अपने पापों का नाश किया। इसके पश्चात भगवान पार्श्वनाथ को केवलज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई और उन्होंने समवशरण में धर्मोपदेश दिया।
चालीसा के लाभ और शिक्षाएँ
इस चालीसा के नित्य पाठ से भूत-पिशाच निकट नहीं आते, सर्प का विष उतरता है, संतानहीन को पुत्र मिलता है, और निर्धन को धन-सुख प्राप्त होता है। चालीस दिन तक पाठ करने से मनवांछित फल मिलता है। साथ ही, यह अहिंसा, सत्य, अचौर्य (चोरी न करना) और त्याग धर्म का पाठ सिखाती है।
Parshvanatha
जैन धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
