धम्मपद — 26 वर्ग एवं 423 पावन गाथाएँ
धम्मपद तथागत भगवान बुद्ध के उपदेशों का विश्वप्रसिद्ध संग्रह है। इसमें 26 वर्गों में 423 छंद (गाथाएँ) समाहित हैं, जो मन की साधना, अष्टांगिक मार्ग, अप्रमाद, कर्म का नियम और परम निर्वाण की प्राप्ति का दिग्दर्शन कराते हैं।
वग्ग
यमक वर्ग (जोड़ी श्लोक)
दस विपरीत जोड़े जो सिखाते हैं कि मन ही समस्त अनुभवों का अग्रदूत है; अशुद्ध मन से दुःख और शुद्ध मन से सुख छाया की भाँति साथ रहता है।
अप्रमाद वर्ग (सजगता)
सतर्कता और जागरूकता (अप्रमाद) को अमृत पद तथा प्रमाद को मृत्यु का मार्ग घोषित करने वाला पावन उपदेश।
चित्त वर्ग (मन का निग्रह)
चंचल और अस्थिर मन को वश में करने की कला; सधा हुआ मन सबसे बड़ा मित्र और अनियंत्रित मन सबसे बड़ा शत्रु है।
पुष्प वर्ग (सद्गुणों की सुगंध)
फूलों के रूपक द्वारा जीवन की नश्वरता; जैसे भौंरा फूल को बिना क्षति पहुँचाए रस लेता है, वैसे ही ज्ञानी संसार में विचरण करे।
बाल वर्ग (अज्ञानी और मूर्ख)
अज्ञानी और मूर्ख के लक्षण; चम्मच दाल का स्वाद कभी नहीं जानता, वैसे ही मूर्ख जीवन भर ज्ञानी के साथ रहकर भी धर्म नहीं समझता।
पण्डित वर्ग (सच्चा ज्ञानी)
सच्चे ज्ञानी के लक्षण; जैसे ठोस चट्टान आँधी से नहीं डोलती, वैसे ही ज्ञानी निंदा और स्तुति से विचलित नहीं होते।
अरहन्त वर्ग (परम मुक्त पुरुष)
पूर्ण मुक्त अरहंतों का गौरव; जिन्होंने समस्त भव-बंधनों को काट दिया है और हंसों की भाँति अनासक्त होकर विचरण करते हैं।
सहस्र वर्ग (हजारों व्यर्थ बातें)
हजारों व्यर्थ शब्दों से शांति देने वाला एक शब्द श्रेष्ठ है; रणभूमि में हजार योद्धाओं को जीतने से स्वयं को जीतना महान है।
पाप वर्ग (अशुभ कर्मों से बचाव)
शुभ करने में शीघ्रता करो; बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, वैसे ही अल्प पाप भी एकत्र होकर भारी दुःख बन जाता है।
दण्ड वर्ग (अहिंसा और करुणा)
सभी प्राणी दण्ड से डरते हैं, सभी को जीवन प्रिय है; दूसरों को अपने समान समझकर न किसी को मारो, न मारने की आज्ञा दो।
जरा वर्ग (वृद्धावस्था और नश्वरता)
यौवन और शरीर की नश्वरता का यथार्थ दर्शन; यह सुंदर दिखने वाला शरीर रोगों का घर है और अंत में जीर्ण-शीर्ण होकर नष्ट होता है।
आत्म वर्ग (स्वयं का उद्धार)
व्यक्ति स्वयं ही अपना स्वामी है; अपने द्वारा ही पाप होता है और अपने ही द्वारा शुद्धि होती है; कोई किसी को शुद्ध नहीं कर सकता।
लोक वर्ग (सांसारिक मोह से मुक्ति)
संसार को पानी के बुलबुले और मरीचिका के समान नश्वर समझो; पृथ्वी के संपूर्ण साम्राज्य से भी बढ़कर स्रोतापन्न (धर्म-प्रवेश) का फल है।
बुद्ध वर्ग (तथागत का स्वरूप)
दुर्लभ है मानव जन्म और दुर्लभ है बुद्ध का प्राकट्य; समस्त बुराइयों से दूर रहना, अच्छाइयों को अपनाना और अपने चित्त को निर्मल करना ही बुद्धों की शिक्षा है।
सुख वर्ग (सच्चा आनंद)
हम कितने सुखपूर्वक वैरियों के बीच वैर-रहित होकर जीते हैं; स्वास्थ्य सबसे बड़ा लाभ है, संतोष सबसे बड़ा धन है और निर्वाण परम सुख है।
प्रिय वर्ग (आसक्ति से मुक्ति)
प्रिय से शोक उत्पन्न होता है, प्रिय से भय पैदा होता है; जो आसक्ति से पूर्णतः मुक्त है, उसे न कोई शोक है, न कोई भय।
क्रोध वर्ग (क्रोध पर विजय)
क्रोध को अक्रोध से जीतो, बुराई को भलाई से जीतो, कंजूस को दान से और झूठे को सत्य से जीतो; जो उठते क्रोध को रोकता है, वही सच्चा सारथी है।
मल वर्ग (मानसिक विकारों का क्षय)
जैसे सुनार चाँदी के मैल को दूर करता है, वैसे ही अपने विकारों को धीरे-धीरे दूर करो; अविद्या संसार का सबसे बड़ा मैल है।
धर्मस्थ वर्ग (सच्चा धर्मात्मा)
केवल बाल सफेद होने से कोई वृद्ध (थेर) नहीं होता; जो सत्य, अहिंसा और शील में स्थित है, वही सच्चा धर्मस्थ और ज्ञानी है।
मार्ग वर्ग (आर्य अष्टांगिक मार्ग)
समस्त मार्गों में आर्य अष्टांगिक मार्ग सर्वश्रेष्ठ है; तुम्हें स्वयं पुरुषार्थ करना होगा, तथागत केवल मार्गदर्शक हैं।
प्रकीर्णक वर्ग (विविध उपदेश)
यदि अल्प सुख का त्याग करने से महान सुख की प्राप्ति होती है, तो बुद्धिमान अल्प सुख को त्याग देता है।
निरय वर्ग (अधर्म का दुष्परिणाम)
झूठ बोलने वाला और कुकर्म करके मुकरने वाला दोनों दुर्गति को प्राप्त होते हैं; विपरीत दृष्टि ही पतन का कारण है।
नाग वर्ग (हाथी के समान सहनशीलता)
जैसे युद्ध में हाथी तीरों को सहता है, वैसे ही मैं अपशब्दों को सहन करूँगा; मूर्ख के साथ संगति से एकांत विचरण श्रेष्ठ है।
तृष्णा वर्ग (तृष्णा का जाल)
असावधान व्यक्ति की तृष्णा लता की तरह बढ़ती है; तृष्णा के प्रवाह को काटो, कामनाओं के जंगल को नष्ट करो; धम्मदान सब दानों में श्रेष्ठ है।
भिक्षु वर्ग (सच्चे भिक्षु के लक्षण)
नेत्र, कान, जिह्वा और मन का संयम श्रेष्ठ है; जो काया, वाणी और मन से शांत है, वही सच्चा भिक्षु परम शांति को प्राप्त करता है।
ब्राह्मण वर्ग (सच्चा श्रेष्ठ मानव)
न जटाओं से, न गोत्र से, न जन्म से कोई ब्राह्मण होता है; जिसमें सत्य और धर्म है, जो राग-द्वेष से मुक्त और अहिंसक है, वही सच्चा ब्राह्मण है।