Bharat Devotion
☸️त्रिपिटक · खुद्दक निकाय

धम्मपद — 26 वर्ग एवं 423 पावन गाथाएँ

धम्मपद तथागत भगवान बुद्ध के उपदेशों का विश्वप्रसिद्ध संग्रह है। इसमें 26 वर्गों में 423 छंद (गाथाएँ) समाहित हैं, जो मन की साधना, अष्टांगिक मार्ग, अप्रमाद, कर्म का नियम और परम निर्वाण की प्राप्ति का दिग्दर्शन कराते हैं।

वग्ग

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अध्याय 1गाथा 1–20 (20)
Yamaka Vagga

यमक वर्ग (जोड़ी श्लोक)

चित्त एवं प्रज्ञा (अध्याय 1–6)

दस विपरीत जोड़े जो सिखाते हैं कि मन ही समस्त अनुभवों का अग्रदूत है; अशुद्ध मन से दुःख और शुद्ध मन से सुख छाया की भाँति साथ रहता है।

🏷️mind, karma, hatred
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अध्याय 2गाथा 21–32 (12)
Appamāda Vagga

अप्रमाद वर्ग (सजगता)

चित्त एवं प्रज्ञा (अध्याय 1–6)

सतर्कता और जागरूकता (अप्रमाद) को अमृत पद तथा प्रमाद को मृत्यु का मार्ग घोषित करने वाला पावन उपदेश।

🏷️heedfulness, vigilance, mindfulness
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अध्याय 3गाथा 33–43 (11)
Citta Vagga

चित्त वर्ग (मन का निग्रह)

चित्त एवं प्रज्ञा (अध्याय 1–6)

चंचल और अस्थिर मन को वश में करने की कला; सधा हुआ मन सबसे बड़ा मित्र और अनियंत्रित मन सबसे बड़ा शत्रु है।

🏷️mind, restlessness, taming the mind
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अध्याय 4गाथा 44–59 (16)
Puppha Vagga

पुष्प वर्ग (सद्गुणों की सुगंध)

चित्त एवं प्रज्ञा (अध्याय 1–6)

फूलों के रूपक द्वारा जीवन की नश्वरता; जैसे भौंरा फूल को बिना क्षति पहुँचाए रस लेता है, वैसे ही ज्ञानी संसार में विचरण करे।

🏷️flowers, impermanence, fragrance of virtue
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अध्याय 5गाथा 60–75 (16)
Bāla Vagga

बाल वर्ग (अज्ञानी और मूर्ख)

चित्त एवं प्रज्ञा (अध्याय 1–6)

अज्ञानी और मूर्ख के लक्षण; चम्मच दाल का स्वाद कभी नहीं जानता, वैसे ही मूर्ख जीवन भर ज्ञानी के साथ रहकर भी धर्म नहीं समझता।

🏷️fool, ignorance, spoon and soup
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अध्याय 6गाथा 76–89 (14)
Paṇḍita Vagga

पण्डित वर्ग (सच्चा ज्ञानी)

चित्त एवं प्रज्ञा (अध्याय 1–6)

सच्चे ज्ञानी के लक्षण; जैसे ठोस चट्टान आँधी से नहीं डोलती, वैसे ही ज्ञानी निंदा और स्तुति से विचलित नहीं होते।

🏷️the wise, unshakable rock, deep lake
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अध्याय 7गाथा 90–99 (10)
Arahanta Vagga

अरहन्त वर्ग (परम मुक्त पुरुष)

सदाचार एवं कर्म (अध्याय 7–13)

पूर्ण मुक्त अरहंतों का गौरव; जिन्होंने समस्त भव-बंधनों को काट दिया है और हंसों की भाँति अनासक्त होकर विचरण करते हैं।

🏷️arahant, enlightenment, freedom
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अध्याय 8गाथा 100–115 (16)
Sahassa Vagga

सहस्र वर्ग (हजारों व्यर्थ बातें)

सदाचार एवं कर्म (अध्याय 7–13)

हजारों व्यर्थ शब्दों से शांति देने वाला एक शब्द श्रेष्ठ है; रणभूमि में हजार योद्धाओं को जीतने से स्वयं को जीतना महान है।

🏷️thousands, self-conquest, single word of peace
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अध्याय 9गाथा 116–128 (13)
Pāpa Vagga

पाप वर्ग (अशुभ कर्मों से बचाव)

सदाचार एवं कर्म (अध्याय 7–13)

शुभ करने में शीघ्रता करो; बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, वैसे ही अल्प पाप भी एकत्र होकर भारी दुःख बन जाता है।

🏷️evil, good deeds, water pot
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अध्याय 10गाथा 129–145 (17)
Daṇḍa Vagga

दण्ड वर्ग (अहिंसा और करुणा)

सदाचार एवं कर्म (अध्याय 7–13)

सभी प्राणी दण्ड से डरते हैं, सभी को जीवन प्रिय है; दूसरों को अपने समान समझकर न किसी को मारो, न मारने की आज्ञा दो।

🏷️the rod, non-violence, empathy
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अध्याय 11गाथा 146–156 (11)
Jarā Vagga

जरा वर्ग (वृद्धावस्था और नश्वरता)

सदाचार एवं कर्म (अध्याय 7–13)

यौवन और शरीर की नश्वरता का यथार्थ दर्शन; यह सुंदर दिखने वाला शरीर रोगों का घर है और अंत में जीर्ण-शीर्ण होकर नष्ट होता है।

🏷️old age, decay, bones
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अध्याय 12गाथा 157–166 (10)
Atta Vagga

आत्म वर्ग (स्वयं का उद्धार)

सदाचार एवं कर्म (अध्याय 7–13)

व्यक्ति स्वयं ही अपना स्वामी है; अपने द्वारा ही पाप होता है और अपने ही द्वारा शुद्धि होती है; कोई किसी को शुद्ध नहीं कर सकता।

🏷️the self, self-reliance, inner master
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अध्याय 13गाथा 167–178 (12)
Loka Vagga

लोक वर्ग (सांसारिक मोह से मुक्ति)

सदाचार एवं कर्म (अध्याय 7–13)

संसार को पानी के बुलबुले और मरीचिका के समान नश्वर समझो; पृथ्वी के संपूर्ण साम्राज्य से भी बढ़कर स्रोतापन्न (धर्म-प्रवेश) का फल है।

🏷️the world, mirage, bubble
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अध्याय 14गाथा 179–196 (18)
Buddha Vagga

बुद्ध वर्ग (तथागत का स्वरूप)

आर्य मार्ग एवं बोधि (अध्याय 14–20)

दुर्लभ है मानव जन्म और दुर्लभ है बुद्ध का प्राकट्य; समस्त बुराइयों से दूर रहना, अच्छाइयों को अपनाना और अपने चित्त को निर्मल करना ही बुद्धों की शिक्षा है।

🏷️buddha, human birth, purifying mind
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अध्याय 15गाथा 197–208 (12)
Sukha Vagga

सुख वर्ग (सच्चा आनंद)

आर्य मार्ग एवं बोधि (अध्याय 14–20)

हम कितने सुखपूर्वक वैरियों के बीच वैर-रहित होकर जीते हैं; स्वास्थ्य सबसे बड़ा लाभ है, संतोष सबसे बड़ा धन है और निर्वाण परम सुख है।

🏷️happiness, contentment, health
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अध्याय 16गाथा 209–220 (12)
Piya Vagga

प्रिय वर्ग (आसक्ति से मुक्ति)

आर्य मार्ग एवं बोधि (अध्याय 14–20)

प्रिय से शोक उत्पन्न होता है, प्रिय से भय पैदा होता है; जो आसक्ति से पूर्णतः मुक्त है, उसे न कोई शोक है, न कोई भय।

🏷️affection, attachment, grief
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अध्याय 17गाथा 221–234 (14)
Kodha Vagga

क्रोध वर्ग (क्रोध पर विजय)

आर्य मार्ग एवं बोधि (अध्याय 14–20)

क्रोध को अक्रोध से जीतो, बुराई को भलाई से जीतो, कंजूस को दान से और झूठे को सत्य से जीतो; जो उठते क्रोध को रोकता है, वही सच्चा सारथी है।

🏷️anger, non-anger, truth
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अध्याय 18गाथा 235–255 (21)
Mala Vagga

मल वर्ग (मानसिक विकारों का क्षय)

आर्य मार्ग एवं बोधि (अध्याय 14–20)

जैसे सुनार चाँदी के मैल को दूर करता है, वैसे ही अपने विकारों को धीरे-धीरे दूर करो; अविद्या संसार का सबसे बड़ा मैल है।

🏷️impurities, withered leaf, ignorance
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अध्याय 19गाथा 256–272 (17)
Dhammaṭṭha Vagga

धर्मस्थ वर्ग (सच्चा धर्मात्मा)

आर्य मार्ग एवं बोधि (अध्याय 14–20)

केवल बाल सफेद होने से कोई वृद्ध (थेर) नहीं होता; जो सत्य, अहिंसा और शील में स्थित है, वही सच्चा धर्मस्थ और ज्ञानी है।

🏷️the righteous, impartial justice, elder
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अध्याय 20गाथा 273–289 (17)
Magga Vagga

मार्ग वर्ग (आर्य अष्टांगिक मार्ग)

आर्य मार्ग एवं बोधि (अध्याय 14–20)

समस्त मार्गों में आर्य अष्टांगिक मार्ग सर्वश्रेष्ठ है; तुम्हें स्वयं पुरुषार्थ करना होगा, तथागत केवल मार्गदर्शक हैं।

🏷️eightfold path, self-effort, anicca
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अध्याय 21गाथा 290–305 (16)
Pakiṇṇaka Vagga

प्रकीर्णक वर्ग (विविध उपदेश)

त्याग एवं मुक्ति (अध्याय 21–26)

यदि अल्प सुख का त्याग करने से महान सुख की प्राप्ति होती है, तो बुद्धिमान अल्प सुख को त्याग देता है।

🏷️miscellaneous, greater joy, wakefulness
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अध्याय 22गाथा 306–319 (14)
Niraya Vagga

निरय वर्ग (अधर्म का दुष्परिणाम)

त्याग एवं मुक्ति (अध्याय 21–26)

झूठ बोलने वाला और कुकर्म करके मुकरने वाला दोनों दुर्गति को प्राप्त होते हैं; विपरीत दृष्टि ही पतन का कारण है।

🏷️niraya, woeful states, liar
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अध्याय 23गाथा 320–333 (14)
Nāga Vagga

नाग वर्ग (हाथी के समान सहनशीलता)

त्याग एवं मुक्ति (अध्याय 21–26)

जैसे युद्ध में हाथी तीरों को सहता है, वैसे ही मैं अपशब्दों को सहन करूँगा; मूर्ख के साथ संगति से एकांत विचरण श्रेष्ठ है।

🏷️elephant, endurance, solitude
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अध्याय 24गाथा 334–359 (26)
Taṇhā Vagga

तृष्णा वर्ग (तृष्णा का जाल)

त्याग एवं मुक्ति (अध्याय 21–26)

असावधान व्यक्ति की तृष्णा लता की तरह बढ़ती है; तृष्णा के प्रवाह को काटो, कामनाओं के जंगल को नष्ट करो; धम्मदान सब दानों में श्रेष्ठ है।

🏷️craving, desire, creeper
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अध्याय 25गाथा 360–382 (23)
Bhikkhu Vagga

भिक्षु वर्ग (सच्चे भिक्षु के लक्षण)

त्याग एवं मुक्ति (अध्याय 21–26)

नेत्र, कान, जिह्वा और मन का संयम श्रेष्ठ है; जो काया, वाणी और मन से शांत है, वही सच्चा भिक्षु परम शांति को प्राप्त करता है।

🏷️bhikkhu, monk, sensory restraint
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अध्याय 26गाथा 383–423 (41)
Brāhmaṇa Vagga

ब्राह्मण वर्ग (सच्चा श्रेष्ठ मानव)

त्याग एवं मुक्ति (अध्याय 21–26)

न जटाओं से, न गोत्र से, न जन्म से कोई ब्राह्मण होता है; जिसमें सत्य और धर्म है, जो राग-द्वेष से मुक्त और अहिंसक है, वही सच्चा ब्राह्मण है।

🏷️brahmin, holy person, truth
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