श्री साईबाबा आरती
शिरडी के साईबाबा की मराठी आरती, जिसकी रचना उनके भक्त माधवराव अडकर ने की; इसमें चरणों में विश्राम और साईं की कृपा की प्रार्थना है।
श्लोक
साईबाबा की आरती, जीवों को सुख देने वाले प्रभु। अपने सेवकों को अपने चरणों की धूल में विश्राम दो, भक्तों को विश्राम दो।
श्लोक 1
काम को जलाकर, आप अपने स्वरूप में मग्न रहते हो। मुमुक्षु जनों को अपने नेत्रों से श्रीरंग का दर्शन कराते हो।
श्लोक 2
जिसके मन में जैसा भाव होता है, उसे वैसा ही अनुभव देते हो। हे दया के सागर, तुम्हारी यही माया है।
श्लोक 3
आपके नाम का ध्यान करने से संसार की व्यथा दूर होती है। आपकी कृति अगाध है, अनाथों को मार्ग दिखाते हो।
श्लोक 4
कलियुग में आप अवतार हुए, सगुण ब्रह्म साकार हैं। अवतीर्ण हुए हैं स्वामी दत्त दिगंबर के रूप में।
श्लोक 5
आठवें दिन गुरुवार को भक्त वारी करते हैं, प्रभु के चरणों को देखने के लिए, जो भव-भय को दूर करते हैं।
श्लोक 6
मेरा निजी धन और संचय आपके चरणों की सेवा है। हे देवाधिदेव, अब आपसे यही माँग है।
श्लोक 7
दीन चातक जैसा चाहता है निर्मल जल और निज सुख। हे माधव, यह पान कराओ, मेरी प्रार्थना की रक्षा करो।
श्लोक 8
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह आरती शिरडी के साईबाबा (लगभग 1838-1918) की उपासना परंपरा से जुड़ी है। इसकी रचना का श्रेय उनके भक्त माधवराव वामनराव अडकर को दिया जाता है, जिन्होंने इसे बीसवीं सदी के आरंभ में साईबाबा के जीवनकाल में लिखा माना जाता है। मराठी भाषा की यह आरती मंदिरों और घरों में पूजा के अंत में, विशेषकर गुरुवार के दिन, बड़ी श्रद्धा से गाई जाती है। दूसरे पद का भाव, "जिसके मन में जैसा भाव, उसे वैसा अनुभव", भगवद्गीता 4.11 के उस उपदेश की याद दिलाता है जिसमें प्रभु कहते हैं कि जो जिस प्रकार उनकी शरण लेता है, वे उसी प्रकार उसे फल देते हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Madhavrao Adkar
क्या आप जानते हैं?
भाषा और रचना
यह आरती मराठी भाषा में है, जिसमें 7 पद और एक ध्रुवपद (कोरस) है। इसे साईंबाबा के मंदिरों में आरती के समय गाया जाता है और यह उनकी सबसे प्रसिद्ध प्रार्थनाओं में से एक है।
रचनाकार
इस आरती का श्रेय साईबाबा के भक्त माधवराव अडकर को दिया जाता है। अंतिम पद में आया 'माधव' शब्द परंपरा के अनुसार कवि का अपना नाम भी माना जाता है और प्रभु को संबोधन भी।
कलियुग में अवतार
चौथे पद में साईंबाबा को कलियुग में सगुण ब्रह्म (साकार ईश्वर) और दत्तात्रेय का अवतार बताया गया है। यह उनके दिव्य स्वरूप को हिंदू परंपरा से जोड़ता है और भक्तों को उनमें ईश्वर का दर्शन करने का आधार देता है।
गुरुवार का महत्व
पाँचवें पद में गुरुवार को भक्तों की वारी (यात्रा) का उल्लेख है। शिरडी में साईंबाबा के दर्शन के लिए गुरुवार विशेष दिन माना जाता है, जब भक्त प्रभु के चरणों में जाकर जन्म-मृत्यु के भय से मुक्ति पाने की कामना करते हैं।
भक्त का पूर्ण समर्पण
छठे और सातवें पद में भक्त अपनी एकमात्र संपत्ति साईं के चरणों की सेवा को बताता है और चातक पक्षी की तरह निर्मल जल (सुख) की याचना करता है। यह पूर्ण समर्पण और आध्यात्मिक प्यास का प्रतीक है।
नाम जप की शक्ति
तीसरे पद में कहा गया है कि साईं का नाम ध्यान करने से संसार के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह नाम जप को मोक्ष का सीधा मार्ग बताता है और साईं की असीम करुणा को दर्शाता है।
