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Embroidered artwork for श्री साईबाबा आरती: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

श्री साईबाबा आरती

श्री साईबाबा आरती

शिरडी के साईबाबा की मराठी आरती, जिसकी रचना उनके भक्त माधवराव अडकर ने की; इसमें चरणों में विश्राम और साईं की कृपा की प्रार्थना है।

श्लोक

आरती साईबाबा सौख्यदातारा जीवा चरणरजतळीं निज दासां विसावां भक्तां विसावा धृ
Aarti Saibaba Saukhyadaataara Jeeva Charanrajataleen Nij Daasaan Visaavaan Bhaktaan Visaavaa

श्लोक 1

जाळुनियां अनंग स्वस्वरूपी राहे दंग मुमुक्षुजना दावी निजडोळां श्रीरंग
Jaluniyaan Anang Svasvaroopee Raahe Dang Mumukshujana Daavee Nijadolaan Shreerang

श्लोक 2

जया मनीं जैसा भाव तया तैसा अनुभव दाविसी दयाघना ऐसी ही तुझी माव
Jaya Maneen Jaisa Bhaav Taya Taisa Anubhav Daavisee Dayaaghana Aisee Hee Tujhee Maav

श्लोक 3

तुमचें नाम ध्यातां हरे संसृतिव्यथा अगाध तव करणी मार्ग दाविसी अनाथा
Tumachen Naam Dhyaataan Hare Sansritivyatha Agaadh Tav Karanee Maarg Daavisee Anaatha

श्लोक 4

कलियुगीं अवतार सगुणब्रह्म साचार अवतीर्ण झालासे स्वामी दत्त दिगंबर
Kaliyugeen Avtaar Sagunabrahm Saachaar Avteerna Jhaalaase Svaamee Datta Digambar

श्लोक 5

आठा दिवसां गुरुवारी भक्त करिती वारी प्रभुपद पहावया भवभय निवारी
Aatha Divsaan Guruvaaree Bhakt Karitee Vaaree Prabhupad Pahaavayaa Bhavabhay Nivaaree

श्लोक 6

माझा निजद्रव्य ठेवा तव चरणसेवा मागणें हेंचि आता तुम्हा देवाधिदेवा
Maajhaa Nijadravya Thevaa Tav Charanasevaa Maaganen Henchi Aataa Tumhaa Devaadhidevaa

श्लोक 7

इच्छित दीन चातक निर्मळ तोय निजसुख पाजावें माधवा या सांभाळ आपुली भाक
Ichhit Deen Chaatak Nirmal Toy Nijasukha Paajaaven Maadhavaa Yaa Saambhaal Aapulee Bhaak

श्लोक 8

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पाठ विधि सुझाव:संध्याकालीन पूजा के अंत में सपरिवार मिलकर दीपक घुमाते हुए आरती गाएं।

पृष्ठभूमि

यह आरती शिरडी के साईबाबा (लगभग 1838-1918) की उपासना परंपरा से जुड़ी है। इसकी रचना का श्रेय उनके भक्त माधवराव वामनराव अडकर को दिया जाता है, जिन्होंने इसे बीसवीं सदी के आरंभ में साईबाबा के जीवनकाल में लिखा माना जाता है। मराठी भाषा की यह आरती मंदिरों और घरों में पूजा के अंत में, विशेषकर गुरुवार के दिन, बड़ी श्रद्धा से गाई जाती है। दूसरे पद का भाव, "जिसके मन में जैसा भाव, उसे वैसा अनुभव", भगवद्गीता 4.11 के उस उपदेश की याद दिलाता है जिसमें प्रभु कहते हैं कि जो जिस प्रकार उनकी शरण लेता है, वे उसी प्रकार उसे फल देते हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Madhavrao Adkar

क्या आप जानते हैं?

भाषा और रचना

यह आरती मराठी भाषा में है, जिसमें 7 पद और एक ध्रुवपद (कोरस) है। इसे साईंबाबा के मंदिरों में आरती के समय गाया जाता है और यह उनकी सबसे प्रसिद्ध प्रार्थनाओं में से एक है।

रचनाकार

इस आरती का श्रेय साईबाबा के भक्त माधवराव अडकर को दिया जाता है। अंतिम पद में आया 'माधव' शब्द परंपरा के अनुसार कवि का अपना नाम भी माना जाता है और प्रभु को संबोधन भी।

कलियुग में अवतार

चौथे पद में साईंबाबा को कलियुग में सगुण ब्रह्म (साकार ईश्वर) और दत्तात्रेय का अवतार बताया गया है। यह उनके दिव्य स्वरूप को हिंदू परंपरा से जोड़ता है और भक्तों को उनमें ईश्वर का दर्शन करने का आधार देता है।

गुरुवार का महत्व

पाँचवें पद में गुरुवार को भक्तों की वारी (यात्रा) का उल्लेख है। शिरडी में साईंबाबा के दर्शन के लिए गुरुवार विशेष दिन माना जाता है, जब भक्त प्रभु के चरणों में जाकर जन्म-मृत्यु के भय से मुक्ति पाने की कामना करते हैं।

भक्त का पूर्ण समर्पण

छठे और सातवें पद में भक्त अपनी एकमात्र संपत्ति साईं के चरणों की सेवा को बताता है और चातक पक्षी की तरह निर्मल जल (सुख) की याचना करता है। यह पूर्ण समर्पण और आध्यात्मिक प्यास का प्रतीक है।

नाम जप की शक्ति

तीसरे पद में कहा गया है कि साईं का नाम ध्यान करने से संसार के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह नाम जप को मोक्ष का सीधा मार्ग बताता है और साईं की असीम करुणा को दर्शाता है।

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