श्री साईं चालीसा
यह एक भक्ति कविता है जो शिर्डी के साईं बाबा के जीवन, उनके चमत्कारों और उनकी करुणा का वर्णन करती है। इसमें बताया गया है कि कैसे वे भक्तों के कष्ट हरते हैं और सभी धर्मों के प्रति समान प्रेम रखते हैं।
श्लोक
पहले मैं साईं के चरणों में अपना सिर झुकाता हूँ। फिर मैं बताऊँगा कि शिर्डी में साईं कैसे आए और पूरी कहानी सुनाऊँगा।
श्लोक 1
साईं की माता और पिता कौन हैं, यह किसी ने नहीं जाना। साईं ने कहाँ जन्म लिया, यह प्रश्न एक पहेली बना रहा।
श्लोक 2
कोई कहता है कि ये अयोध्या के भगवान रामचन्द्र हैं। कोई कहता है कि साईंबाबा पवनपुत्र हनुमान हैं।
श्लोक 3
कोई कहता है कि साईं मंगलमूर्ति श्री गजानन हैं। कोई कहता है कि साईं गोकुल के मोहन और देवकी के नंदन हैं।
श्लोक 4
अनेक भक्त साईं को शंकर समझकर उनका भजन करते हैं। कोई उन्हें दत्तात्रेय का अवतार मानकर उनकी पूजा करता है।
श्लोक 5
तुम उन्हें कुछ भी मानो, पर साईं सच्चे भगवान हैं। वे बड़े दयालु और दीनबन्धु हैं, उन्होंने अनेकों को जीवनदान दिया है।
श्लोक 6
मैं तुम्हें कई वर्ष पहले की एक घटना सुनाता हूँ। किसी भाग्यशाली व्यक्ति की शिर्डी में बारात आई थी।
श्लोक 7
उस बारात के साथ एक बहुत सुंदर बालक आया। वह आकर वहीं बस गया और शिर्डी नगर को पवित्र कर दिया।
श्लोक 8
वह कई दिनों तक भटकता रहा और दर-दर भिक्षा माँगी। उसने ऐसी लीला दिखाई जो जगत में अमर हो गई।
श्लोक 9
जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ी, वैसे-वैसे उसकी शान बढ़ती गई। नगर में घर-घर साईं बाबा का गुणगान होने लगा।
श्लोक 10
तब साईंजी का नाम दिशाओं में गूँजने लगा। दीन-दुखियों की रक्षा करना ही बाबा का काम था।
श्लोक 11
जो कोई बाबा के चरणों में जाकर कहता है कि मैं निर्धन हूँ, उसी पर उनकी दया होती है और दुःख के बंधन खुल जाते हैं।
श्लोक 12
कभी किसी ने भिक्षा माँगी कि बाबा मुझे संतान दो। तब साईं 'एवं अस्तु' कहकर उसे वरदान देते थे।
श्लोक 13
दीन-दुखियों की दशा देखकर बाबा स्वयं दुःखी हो जाते थे। श्री साईं का अंत:करण सागर के समान विशाल था।
श्लोक 14
एक मद्रासी भक्त आया, जो घर का बहुत बड़ा धनवान था। उसके पास अपार धन-खजाना था, परंतु संतान नहीं थी।
श्लोक 15
वह साईंनाथ को मनाने लगा, "बाबा, मुझ पर दया करो। झंझा से झकझोरी हुई मेरी नैया को तुम ही पार करो।"
श्लोक 16
"कुलदीपक के अभाव में धन की माया व्यर्थ है। आज मैं भिखारी बनकर बाबा, तुम्हारी शरण में आया हूँ।"
श्लोक 17
"मुझे पुत्रदान दो, मैं जीवनभर तुम्हारा ऋणी रहूँगा। मुझे किसी और से आशा नहीं, केवल तुम पर भरोसा है।"
श्लोक 18
उसने चरणों में सिर रखकर बहुत अनुनय-विनय की। तब प्रसन्न होकर बाबा ने भक्त को यह आशीष दी।
श्लोक 19
"अल्लाह तेरा भला करेगा, तेरे घर पुत्र जन्म लेगा। उसकी कृपा तुझ पर और तेरे उस बालक पर होगी।"
श्लोक 20
अब तक किसी ने साईं की कृपा का पार नहीं पाया। मद्रासी को पुत्ररत्न देकर उसने उसका संसार धन्य कर दिया।
श्लोक 21
जो तन-मन से साईं का भजन करता है, उसका जगत में उद्धार होता है। सत्य को कभी आँच नहीं आती, झूठ की सदा हार होती है।
श्लोक 22
मैं सदा उसके सहारे हूँ और सदा उसका दास रहूँगा। साईं जैसा प्रभु मिल गया, तो फिर और क्या आस कम है?
श्लोक 23
मेरा भी एक ऐसा दिन था जब मुझे रोटी नहीं मिलती थी। तन पर कपड़ा तो दूर, केवल एक छोटी सी लँगोटी रह गई थी।
श्लोक 24
नदी सामने होने पर भी मैं प्यासा ही रहता था। मेरे दुर्दिन मुझ पर दावाग्नि बरसाते थे।
श्लोक 25
धरती के अलावा जगत में मेरा कोई सहारा नहीं था। मैं दुनिया में भिखारी बनकर दर-दर ठोकरें खाता था।
श्लोक 26
ऐसे में मुझे एक मित्र मिला जो साईं का परम भक्त था। वह जंजालों से मुक्त था, पर इस जगत में वह मेरे जैसा ही था।
श्लोक 27
दोनों ने मिलकर बाबा के दर्शन का विचार किया। हम साईं जैसी दयामूर्ति के दर्शन के लिए तैयार हो गए।
श्लोक 28
पवन शिर्डी नगरी में जाकर हमने उस मतवाली मूर्ति को देखा। जब हमने साईं की सूरत देखी, तो हमारा जन्म धन्य हो गया।
श्लोक 29
जबसे हमने दर्शन किए, सारा दुःख काफूर हो गया। सारे संकट मिट गए और विपदाओं का अंत हो गया।
श्लोक 30
बाबा से हमें भिक्षा में मान और सम्मान मिला। हम साईं की आभा से जगत में प्रतिबिम्बित हो उठे।
श्लोक 31
बाबा ने इस जीवन में मुझे सम्मान और मान दिया है। इसी का सहारा लेकर मैं जीवन में हँसता हुआ चलूँगा।
श्लोक 32
साईं की लीला का मेरे मन पर ऐसा प्रभाव हुआ कि लगता है जगत के कण-कण में वे भरे हुए हैं।
श्लोक 33
शिर्डी में काशीराम नाम का बाबा का भक्त रहता था। वह दुनिया से कहता था, "मैं साईं का हूँ और साईं मेरे हैं।"
श्लोक 34
वह स्वयं गाँवों, नगरों और बाज़ारों में कपड़ा बेचता था। उसके हृदय की तंत्री साईं की झंकारों में झंकृत होती थी।
श्लोक 35
रात स्तब्ध थी, चाँद-तारे रजनी की आँचल में सोए हुए थे। अँधेरे के कारण हाथ को हाथ नहीं सूझता था।
श्लोक 36
हाय! काशी हाट से कपड़ा बेचकर लौट रहा था। बड़ा विचित्र संयोग था कि उस दिन वह अकेला आ रहा था।
श्लोक 37
कुटिल और अन्यायी लोगों ने रास्ते में उसे घेर लिया। "मारो, काटो, लूटो इसको" – यह आवाज़ सुनाई दी।
श्लोक 38
कुटिल लोग उसे लूट-पीटकर वहाँ से भाग गए। आघातों से मर्माहत होकर उसने संज्ञा खो दी।
श्लोक 39
वह बहुत देर तक वहीं उसी हालत में पड़ा रहा। पता नहीं कब किसी पलक में उसे कुछ होश आया।
श्लोक 40
अनजाने में ही उसके मुँह से 'साईं' निकल पड़ा। उसकी प्रतिध्वनि शिर्डी में बाबा को सुनाई पड़ी।
श्लोक 41
उनका मानस क्षुब्ध हो उठा, बाबा विकल हो गए। लगता था मानो सारी घटना उन्हीं के सामने घटी हो।
श्लोक 42
तब बाबा उन्मादी की तरह इधर-उधर भटकने लगे। जो भी चीज़ सामने आई, उसे पटकने लगे।
श्लोक 43
और बाबा ने धधकते अंगारों में अपना हाथ डाल दिया। वहाँ सभी सशंकित हो गए, उस निराले तांडव नृत्य को देखकर।
श्लोक 44
सब लोग समझ गए कि कोई भक्त संकट में पड़ा है। सभी वहाँ क्षुब्ध और विस्मय में खड़े थे।
श्लोक 45
उस भक्त को बचाने के लिए ही बाबा आज विकल हैं। उसकी पीड़ा से ही उनका अंत:स्थल पीड़ित है।
श्लोक 46
इतने में ही विधि ने अपनी विचित्रता दिखलाई। जिसे देखकर जनता की श्रद्धा-सरिता लहरा उठी।
श्लोक 47
एक गाड़ी वहाँ आई जिसमें वह संज्ञाहीन भक्त था। सामने अपने भक्त को देखकर साईं की आँखें भर आईं।
श्लोक 48
बाबा का अंत:स्थल शांत, धीर और गंभीर सिंधु के समान था। आज न जाने क्यों वह रह-रहकर चंचल हो जाता था।
श्लोक 49
आज दया की मूर्ति स्वयं उपचारी बन गए थे। और भक्त के लिए आज वे देव बनकर प्रतिहारी बने थे।
श्लोक 50
आज भक्ति की विषम परीक्षा में काशी सफल हुआ था। उसी के दर्शन के लिए नगर-निवासी उमड़ पड़े थे।
श्लोक 51
जब भी और जहाँ भी कोई भक्त संकट में पड़ता है, उसकी रक्षा करने बाबा पलभर में आते हैं।
श्लोक 52
यह युगों-युगों का सत्य है, कोई नई कहानी नहीं। जब भक्त आपातग्रस्त होता है, तो अंतर्यामी स्वयं आते हैं।
श्लोक 53
साईं भेद-भाव से परे, मानवता के पुजारी थे। हिंदू और मुस्लिम जितने प्यारे थे, उतने ही सिख और ईसाई भी थे।
श्लोक 54
बाबा ने मंदिर-मस्जिद का भेद-भाव तोड़-फोड़ डाला। राम और रहीम दोनों उनके थे, कृष्ण, करीम और अल्लाहताला भी।
श्लोक 55
घंटे की प्रतिध्वनि से मस्जिद का कोना-कोना गूँज उठा। हिंदू और मुस्लिम आपस में मिले, प्रेम दिन-दिन दुगना बढ़ा।
श्लोक 56
कितना सुंदर चमत्कार था जो इस काया ने दिया। और नीम की कड़ुवाहट में भी बाबा ने मिठास भर दी।
श्लोक 57
साईं ने सबको स्नेह दिया, सबको समान प्यार किया। जिसने जो कुछ चाहा, बाबा ने उसे वही दिया।
श्लोक 58
ऐसे स्नेहशील भाजन का नाम जो सदा जपता है, चाहे पर्वत जैसा दुःख क्यों न हो, वह पलभर में दूर हो जाता है।
श्लोक 59
अरे! हमने साईं जैसा दाता किसी को नहीं देखा। जिसके केवल दर्शन मात्र से सारी विपदाएँ दूर हो गईं।
श्लोक 60
तन में साईं, मन में साईं, साईं-साईं भजा करो। अपने तन की सुध-बुध खोकर उनकी सुधि किया करो।
श्लोक 61
जब तू अपनी सुधि त्यागकर बाबा की सुधि किया करेगा, और रात-दिन बाबा-बाबा ही रटा करेगा।
श्लोक 62
तो बाबा को विवश होकर तेरी सुधि लेनी ही होगी। तेरी हर इच्छा बाबा को पूरी ही करनी होगी।
श्लोक 63
हे पागल! बाबा को ढूँढ़ने के लिए जंगल-जंगल मत भटक। केवल एक जगह शिर्डी में ही तू बाबा को पाएगा।
श्लोक 64
जगत में वह प्राणी धन्य है जिसने बाबा को पाया। चाहे दुःख हो या सुख, आठों पहर वह साईं का ही गुण गाता है।
श्लोक 65
चाहे संकटों के पर्वत गिरें, चाहे बिजली ही टूट पड़े। तुम सदा साईं का नाम लेकर सबके सामने डटे रहो।
श्लोक 66
इस बूढ़े की करामात सुनकर तुम हैरान हो जाओगे। जिसे सुनकर कितने ही चतुर और सुजान दंग रह गए।
श्लोक 67
एक बार शिर्डी में एक ढोंगी साधू आया। वह भोली-भाली नगर-निवासी जनता को भरमा रहा था।
श्लोक 68
वह जड़ी-बूटियाँ दिखाकर वहाँ भाषण करने लगा। वह कहने लगा, "सुनो श्रोताओ, मेरा घर वृन्दावन है।"
श्लोक 69
"मेरे पास एक औषधि है और उसमें अद्भुत शक्ति है। इसके सेवन मात्र से दुःख से मुक्ति मिल जाती है।"
श्लोक 70
"यदि तुम संकट और बीमारी से मुक्त होना चाहते हो, तो मेरा हर नर और हर नारी से नम्र निवेदन है।"
श्लोक 71
"इसे खरीद लो, इसकी सेवन विधियाँ न्यारी हैं। यद्यपि यह तुच्छ वस्तु है, पर इसके गुण अति भारी हैं।"
श्लोक 72
"जो यहाँ संतानहीन हैं, यदि वे मेरी औषधि खाएँ, तो उन्हें पुत्ररत्न प्राप्त होगा और वे मुँहमाँगा फल पाएँगे।"
श्लोक 73
"जो मेरी औषधि नहीं खरीदेगा, वह जीवनभर पछताएगा। अरे! मेरे जैसा प्राणी शायद ही यहाँ फिर आएगा।"
श्लोक 74
"दुनिया दो दिन का मेला है, तुम भी मौज-शौक कर लो। यदि इससे सब कुछ मिलता है, तो तुम भी इसे ले लो।"
श्लोक 75
जनता की हैरानी बढ़ती जा रही थी, उसकी कारस्तानी देखकर। वह भी मन ही मन प्रमुदित था, लोगों की नादानी देखकर।
श्लोक 76
एक सेवक दौड़कर यह खबर बाबा को सुनाने गया। सुनते ही बाबा की भृकुटि तन गई और सारा विवेक विस्मृत हो गया।
श्लोक 77
उसने सेवक को हुक्म दिया, "शीघ्र उस दुष्ट को पकड़कर लाओ, या शिर्डी की सीमा से उस कपटी को दूर भगाओ।"
श्लोक 78
"मेरे रहते कौन ऐसा नीच है जो शिर्डी की भोली-भाली जनता को छलने का साहस करता है?"
श्लोक 79
"पलभर में ही ऐसे ढोंगी, कपटी, नीच लुटेरे को मैं जीवनभर के लिए महानाश के महागर्त में पहुँचा दूँ।"
श्लोक 80
उस क्रूर, कुटिल, अन्यायी मदारी को तनिक आभास मिल गया। "अब काल तेरे सिर पर नाच रहा है, साईं को गुस्सा आया है।"
श्लोक 81
पलभर में सब खेल बंद करके वह सिर पर पैर रखकर भागा। वह मन ही मन सोच रहा था, "अब भगवान से कोई खैर नहीं।"
श्लोक 82
यह सच है कि साईं जैसा दानी जगत में नहीं मिल सकता। साईंबाबा ईश के अंश हैं, उनके लिए जगत में कुछ भी मुश्किल नहीं।
श्लोक 83
जो कोई स्नेह, शील, सौजन्य आदि के आभूषण धारण करके मानव-सेवा के पथ पर बढ़ता है।
श्लोक 84
वही जगत के जन-जन के अंत:स्थल को जीत लेता है। उसकी एक उदासी ही जग को विह्वल कर देती है।
श्लोक 85
जब-जब जगत में पाप का भार बढ़-बढ़कर बहुत हो जाता है, तब उसे मिटाने के लिए अवतारी आता है।
श्लोक 86
वह इस जगत के सारे पाप और अन्याय को हरकर, दुनिया के दानवों को क्षणभर में दूर भगा देता है।
श्लोक 87
तब इस दुनिया में स्नेह-सुधा की धार बरसने लगती है। जन-जन आपस में गले मिलने लगते हैं।
श्लोक 88
ऐसे ही अवतारी साईं मृत्युलोक में आकर, अपने आपको मिटाकर सबको समता का यह पाठ पढ़ाया।
श्लोक 89
साईं ने शिर्डी में मस्जिद का नाम द्वारका रखा। उन्होंने दाप, ताप और संताप मिटाया; जो कुछ भी आया, साईं ने किया।
श्लोक 90
साईं सदा राम की याद में मस्त होकर बैठे रहते थे। आठों पहर वे राम नाम का ही भजन करते थे।
श्लोक 91
चाहे सूखी-रूखी हो, ताजी-बासी हो, या पकवान ही क्यों न हो। साईं के लिए सब समान थे, क्योंकि वे सदा प्रेम के भूखे थे।
श्लोक 92
लोग अपने स्नेह और श्रद्धा से जो कुछ दे जाते थे, बाबा उस भोजन को बड़े चाव से पावन करते थे।
श्लोक 93
कभी-कभी मन बहलाने के लिए बाबा बाग में जाते थे। प्रसन्न मन से वे प्रकृति की छटा को निहारते थे।
श्लोक 94
बाग के रंग-बिरंगे फूल मंद-मंद हिल-डुलकर, बीहड़ और वीराने मन में भी स्नेह-सलिल भर देते थे।
श्लोक 95
ऐसी सुमधुर बेला में भी, दुःख, आपात और विपदा के मारे लोग अपने मन की व्यथा सुनाने बाबा को घेरे रहते थे।
श्लोक 96
उनकी करुण कथा सुनकर बाबा के कमल-नयन भर आते थे। वे विभूति देकर हर व्यथा हर लेते और उनके हृदय में शांति भर देते थे।
श्लोक 97
पता नहीं उस विभूति में क्या अद्भुत शक्ति होती थी। जो इसे मस्तक पर धारण करता, उसका सारा दुःख हर लेती थी।
श्लोक 98
धन्य हैं वे मनुष्य जिन्होंने बाबा साईं के साक्षात दर्शन पाए। धन्य हैं उनके कमल-कर जिनसे उन्होंने चरण-कमल स्पर्श किए।
श्लोक 99
काश! तुम्हें भी निर्भय होकर साक्षात साईं मिल जाते। तो बरसों से उजड़ा तुम्हारा चमन आज फिर से खिल जाता।
श्लोक 100
यदि मैं उनके श्रीचरण पकड़ लेता, तो उम्रभर नहीं छोड़ता। यदि साईं मुझ पर रूठते, तो मैं उन्हें ज़रूर मना लेता।
श्लोक 101
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह भक्ति कविता शिर्डी के साईं बाबा को समर्पित है, जो उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के एक महान संत थे। यह रचना उनके जीवन, लीलाओं और उपदेशों का वर्णन करती है, जिसमें उनकी दयालुता, सर्वधर्म समभाव और भक्तों के प्रति प्रेम पर जोर दिया गया है। इस प्रकार की रचनाएँ प्रायः साईं भक्तों द्वारा उनकी आराधना, गुणगान और ध्यान के समय गाई या पढ़ी जाती हैं।
क्या आप जानते हैं?
अनेक रूपों में पहचान
इस भजन में बाबा की पहचान को लेकर अलग-अलग मतों का जिक्र है – कोई उन्हें राम, कोई हनुमान, कोई गणेश, कोई कृष्ण, कोई शिव और कोई दत्तात्रेय का अवतार मानता है। यह दर्शाता है कि साईं बाबा सभी धर्मों और आस्थाओं को अपनाने वाले एक सर्वव्यापी संत थे।
काशीराम की रक्षा हेतु तांडव
एक बार भक्त काशीराम (जो स्वयं कपड़े बेचते थे) पर डाकुओं ने हमला कर दिया। बेहोश पड़े काशीराम के मुंह से अनजाने में 'साईं' निकल गया। शिर्डी में बाबा को यह सुनाई दिया और वे विक्षिप्त होकर जलते अंगारों पर नृत्य करने लगे। यह घटना बाबा और उनके भक्तों के बीच के अदृश्य संबंध का अद्भुत उदाहरण है।
धार्मिक एकता का प्रतीक द्वारकामाई
बाबा ने शिर्डी की एक मस्जिद को 'द्वारकामाई' नाम दिया। वहाँ वे हिंदू और मुस्लिम दोनों के साथ बैठते थे, मंदिर और मस्जिद की दीवार तोड़कर एक ही स्थान पर घंटे और अज़ान दोनों की गूंज सुनाई देती थी। यह दिखाता है कि बाबा के लिए सभी धर्म समान थे।
ढोंगी साधु का परदाफाश
एक धोखेबाज साधु शिर्डी आया और नकली जड़ी-बूटियाँ बेचने लगा, जिससे संतानहीन लोगों को पुत्र प्राप्ति का झूठा वादा किया। जैसे ही यह खबर बाबा तक पहुँची, उन्होंने तुरंत उसे शिर्डी से बाहर निकालने का आदेश दिया। यह दर्शाता है कि बाबा अपने भक्तों को किसी भी प्रकार के छल या अंधविश्वास से बचाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
भक्त पर अटूट विश्वास का फल
इस भजन में एक मद्रासी (चेन्नई) धनवान भक्त का वर्णन है, जो निःसंतान था। वह साईं की शरण में आया और उनसे पुत्र दान माँगा। बाबा ने कहा, 'अल्लाह भला करेगा तेरा', और उसे आशीर्वाद दिया। इससे पता चलता है कि बाबा भक्तों की व्यक्तिगत परेशानियों को समझते थे और उनकी हर समस्या का समाधान करते थे।
