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Embroidered artwork for केसरिया स्तूप एवं वैशाली: आम्रपाली का विहार: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

केसरिया स्तूप एवं वैशाली

आम्रपाली का विहार

केसरिया स्तूप एवं वैशाली

आम्रपाली का विहार

बिहार के वैशाली और केसरिया भिक्षुणी संघ की स्थापना, रतन सुत्त और बुद्ध के भिक्षापात्र-दान की पावन स्मृति संजोए हैं।

संक्षिप्त तीर्थ मार्गदर्शिका (Quick Devotional Guide)

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    यह क्या है: महाकरुणा की पावन तपोभूमि जहाँ तथागत बुद्ध ने प्रथम बार महिलाओं को प्रव्रज्या प्रदान कर 'भिक्षुणी संघ' की स्थापना की, महाव्याधियों के शमन हेतु 'रतन सुत्त' का उपदेश दिया और महापरिनिर्वाण से पूर्व केसरिया में प्रजा को अपना पावन भिक्षापात्र भेंट किया।
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    दर्शन व जप का फल: यहाँ 'रतन सुत्त' का सस्वर पाठ और स्तूपों की भावपूर्ण प्रदक्षिणा करने से समस्त प्रकार के रोग, मानसिक अशांति, और पाप-कर्मों का क्षय होता है तथा अंतर्मन में शांति और बोधि की प्राप्ति होती है।
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    कब जाएं: अक्टूबर से मार्च तक का समय सर्वोत्तम है। वैशाख पूर्णिमा (बुद्ध पूर्णिमा), आषाढ़ पूर्णिमा और माघ पूर्णिमा (परिनिर्वाण घोषणा दिवस) यहाँ के मुख्य आध्यात्मिक पर्व हैं।
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    कहाँ स्थित है: बिहार के वैशाली और पूर्वी चंपारण जिले में, पवित्र गंडक नदी की पावन घाटी में स्थित। निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन मुजफ्फरपुर और विमानक्षेत्र पटना है।
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    दर्शन विधि व नियम: पंचशील का पालन करते हुए यात्रा करें। कोल्हुआ स्थित अशोक स्तंभ और आनंद स्तूप की प्रदक्षिणा से प्रारंभ करें। केसरिया स्तूप पर पुष्प, दीप और सुगंधित द्रव्य अर्पित कर मौन ध्यान लगाएं।

पावन उद्गम एवं पौराणिक / शास्त्रीय पृष्ठभूमि

वैशाली बौद्ध परंपरा में तथागत के जीवन और चमत्कारों की अत्यंत वंदनीय भूमि है; 'रतन सुत्त' सुत्तनिपात के द्वितीय वर्ग के प्रथम सुत्त (सुत्तनिपात २.१) के रूप में संरक्षित है। प्राचीन लिच्छवि गणराज्य के समय वैशाली एक भीषण त्रिविध संकट—अकाल, प्रेतबाधा और संक्रामक महामारी—से घिर गई थी। असहाय होकर लिच्छवि नरेशों ने मगध में विराजित तथागत बुद्ध की शरण ली। जैसे ही भगवान के चरण वैशाली की धरा पर पड़े, मूसलाधार वर्षा से भूमि पावन हो उठी। भगवान बुद्ध ने आयुष्मान आनंद को निर्देश दिया कि वे भगवान के भिक्षापात्र में जल लेकर नगर के परकोटों पर छिड़कें और 'रतन सुत्त' का पाठ करें। इस दिव्य पाठ के प्रभाव से समूचा नगर व्याधिमुक्त हो गया और चहुंओर शांति छा गई।

इसी वैशाली के महावन स्थित कुटागारशाला विहार में वह युगांतरकारी घटना घटी जिसने संपूर्ण आध्यात्मिक जगत को आलोकित कर दिया। भगवान बुद्ध की विमाता महापजापती गोतमी पांच सौ शाक्य कुलीन स्त्रियों के साथ पदयात्रा कर यहाँ पहुँचीं। आयुष्मान आनंद के विनम्र अनुरोध और स्त्रियों की आध्यात्मिक क्षमता को स्वीकार करते हुए भगवान ने महिलाओं के लिए 'भिक्षुणी संघ' के द्वार खोले। इसी पावन क्षेत्र में सुप्रसिद्ध राजनर्तकी आम्रपाली ने अपना आम्रवन संघ को दान देकर अर्हत् पद प्राप्त किया।

अस्सी वर्ष की अवस्था में तथागत ने चापाल चैत्य में अपनी देहत्याग की घोषणा की और वैशाली को 'नागपलोकन' (गज के समान शांत दृष्टि) से निहारते हुए अंतिम विदाई दी। जब शोकाकुल लिच्छवि जनता उनके पीछे-पीछे चलने लगी, तो भगवान ने अपनी शक्ति से एक विशाल जलधारा उत्पन्न कर उन्हें रोका और अपने प्रेम के शाश्वत प्रतीक स्वरूप अपना भिक्षापात्र उन्हें उपहार में दिया। उसी पावन विदाई स्थल पर सबसे ऊंचे प्राचीन ईंट-निर्मित स्तूपों में गिना जाने वाला 'केसरिया स्तूप' बना।

प्रमुख पवित्र स्थल व मंदिर

केसरिया स्तूप (देवालय)
क्षेत्र व भूगोल:पूर्वी चंपारण जिला, बिहार; ऐतिहासिक गंडक मार्ग
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:104 फीट ऊंचा बहु-स्तरीय स्तूप; भगवान के भिक्षापात्र दान की पावन स्मृति
पूजन एवं उत्सव:पूर्णिमा पर महाप्रदक्षिणा, सहस्त्र दीप प्रज्वलन
आध्यात्मिक महत्व:त्याग और अनासक्ति का जीवंत प्रतीक; प्राचीन ईंट-निर्मित स्तूपों में सबसे ऊंचों में से एक।
कोल्हुआ अशोक स्तंभ एवं स्तूप
क्षेत्र व भूगोल:कोल्हुआ, वैशाली
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:एक ही बलुआ पत्थर से तराशा गया स्तंभ जिसके शीर्ष पर सिंह विराजमान है
पूजन एवं उत्सव:आनंद स्तूप पर चीवर अर्पण, रतन सुत्त का पाठ
आध्यात्मिक महत्व:भगवान के अंतिम उपदेश और वानरों द्वारा मधु-दान की अद्भुत लीला का स्थान।
लिच्छवि धातु स्तूप
क्षेत्र व भूगोल:वैशाली गढ़ के समीप
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:ईंटों से निर्मित प्राचीन स्तूप जहाँ बुद्ध के अस्थि-अवशेष सुरक्षित थे
पूजन एवं उत्सव:मौन विपश्यना ध्यान, पुष्पांजलि
आध्यात्मिक महत्व:परंपरा के अनुसार तथागत के अस्थि-अवशेषों के आठवें भाग का स्थान।
कुटागारशाला विहार व रामकुंड
क्षेत्र व भूगोल:महावन, वैशाली
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:प्राचीन विहार जहाँ भिक्षुणी संघ की औपचारिक स्थापना हुई
पूजन एवं उत्सव:थेरीगाथा का पाठ, संघ वंदना
आध्यात्मिक महत्व:आध्यात्मिक समानता का अमर प्रतीक जहाँ नारी चेतना को संन्यास की दीक्षा मिली।
अभिषेक पुष्करिणी
क्षेत्र व भूगोल:वैशाली दुर्ग परिक्षेत्र
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:पवित्र सरोवर जिसके जल से प्राचीन गणराज्य के राजाओं का राज्याभिषेक होता था
पूजन एवं उत्सव:आचमन, तट पर शांति-पाठ
आध्यात्मिक महत्व:सहस्रों अर्हतों के चरण-रज से पूजित परम पवित्र तीर्थ जल।

संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परंपरा

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    माता महापजापती गोतमी एवं आम्रपाली: भिक्षुणी संघ की अग्रणी संन्यासिनियां जिन्होंने सिद्ध किया कि मोक्ष और अर्हत् पद पर लिंग या सामाजिक स्थिति का कोई बंधन नहीं है।
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    सम्राट अशोक महान (तीसरी शताब्दी ई.पू.): जिन्होंने कोल्हुआ में एकाश्म सिंह स्तंभ स्थापित किया और भगवान के अवशेषों की सुरक्षा हेतु भव्य स्तूपों का विस्तार कराया।
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    चीनी यात्री फाह्यान एवं ह्वेनसांग: जिन्होंने पांचवीं और सातवीं शताब्दी में यहाँ आकर केसरिया स्तूप और भिक्षापात्र से जुड़ी चमत्कारी गाथाओं का विशद वर्णन किया।
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    द्वितीय बौद्ध संगीति (383 ई.पू.): महापरिनिर्वाण के लगभग 100 वर्ष पश्चात 700 अर्हतों ने वैशाली में एकत्र होकर विशुद्ध विनय और त्रिपिटक के नियमों का संरक्षण किया।

पावन श्लोक एवं ध्यान मंत्र

सर्वप्रकार के संकटों और रोगों के शमन के लिए वैशाली में तथागत द्वारा उच्चारित 'रतन सुत्त' का नित्य पाठ करना चाहिए:

यानीध भूतानि समागतानि भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खे।

सब्बेव भूता सुमना भवन्तु अथोपि सक्कच्च सुणन्तु भासितं॥

यं किञ्चि वित्तं इध वा हुरं वा सग्गेसु वा यं रतनं पणीतं।

न नो समं अत्थि तथागतेन इदम्पि बुद्धे रतनं पणीतं एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु॥

यानीध भूतानि समागतानि, भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खे |

सब्बेव भूता सुमना भवन्तु, अथोपि सक्कच्च सुणन्तु भासितं ||

यं किञ्चि वित्तं इध वा हुरं वा, सग्गेसु वा यं रतनं पणीतं |

न नो समं अत्थि तथागतेन, इदम्पि बुद्धे रतनं पणीतं एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ||

भावार्थ: "यहाँ उपस्थित समस्त भूचर और नभचर प्राणी प्रसन्नचित्त हों और एकाग्र होकर इन सत्य वचनों का श्रवण करें। इस लोक में, परलोक में अथवा स्वर्ग में ऐसा कोई श्रेष्ठ रत्न या संपदा नहीं है जो तथागत बुद्ध के समान हो। बुद्ध में ही यह अद्वितीय रत्न प्रतिष्ठित है; इस सत्य के प्रभाव से सभी जीवों का सर्वथा कल्याण हो!"

क्या आप जानते हैं?

केसरिया स्तूप आज लगभग 104 फीट ऊंचा है और प्राचीन ईंट-निर्मित सबसे ऊंचे स्तूपों में गिना जाता है; इसकी कई मंजिलें अब भी उत्खनन से उजागर हो रही हैं।

कोल्हुआ में स्थित अशोक स्तंभ सम्राट अशोक के उन दुर्लभ स्तंभों में से एक है जिसका शीर्ष (बैठा हुआ सिंह) आज भी पूर्णतः सुरक्षित है।

वैशाली लिच्छवियों की भूमि के रूप में स्मरण की जाती है, जिनका सभा-आधारित गणराज्य इतिहास में सबसे प्राचीन ज्ञात गणराज्यों में से एक है।

वर्ष 1958 में वैशाली के लिच्छवि स्तूप के उत्खनन से एक पाषाण मंजूषा प्राप्त हुई थी जिसमें तथागत बुद्ध के पावन अस्थि अवशेष और भस्म सुरक्षित थे।

कोल्हुआ वही पावन स्थान है जहाँ वानरों के समूह ने वृक्ष से मधु संचित कर अत्यंत श्रद्धापूर्वक भगवान बुद्ध को भिक्षापात्र में अर्पित किया था।

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