ॐ जय जगदीश हरे
यह एक प्रसिद्ध हिंदू भजन है जिसमें भक्त भगवान विष्णु (जगदीश) की स्तुति करते हैं और उनसे अपने कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। यह भजन प्रार्थना और आरती के समय गाया जाता है।
श्लोक
प्रभु जगदीश्वर की जय हो! वे भक्तों और सेवकों के सब संकटों को क्षण भर में दूर कर देते हैं।
श्लोक 1
जो प्रभु का ध्यान करता है, वह फल पाता है, उसके मन के दुःख और चिंता दूर हो जाते हैं। उसके घर में सुख और सम्पत्ति आती है और शरीर के कष्ट मिट जाते हैं।
श्लोक 2
हे प्रभु! आप ही मेरे माता-पिता हैं। मैं और किसकी शरण लूँ? आपके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है जिससे मैं आशा रखूँ।
श्लोक 3
आप परमात्मा परिपूर्ण हैं, आप अंतर्यामी हैं। आप परब्रह्म परमेश्वर हैं और सबके स्वामी हैं।
श्लोक 4
आप करुणा के सागर और पालनकरता हैं। मैं मूर्ख हूँ, फल की कामना रखता हूँ। मैं सेवक हूँ, आप स्वामी हैं। हे पालनकर्ता! मुझर कृपा कीजिए।
श्लोक 5
आप एक अगोचर हैं, सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय! मैं मूर्ख हूँ, किस विधि से आपको प्राप्त करूँ?
श्लोक 6
आप दीनों के बंधु और दुखों को हरने वाले हैं। हे ठाकुर! आप मेरे रक्षक हैं। अपने हाथ उठाकर मुझे अपनी शरण में लीजिए, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।
श्लोक 7
हे देव! विषय-विकारों को मिटाइए और पापों को हरिए। श्रद्धा और भक्ति बढ़ाइए और संतों की सेवा में लगाइए।
श्लोक 8
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला
तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन
- परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति
पृष्ठभूमि
यह भजन वैष्णव भक्ति परंपरा का एक प्रसिद्ध भजन है, जिसे प्रायः संध्या आरती और घरेलू पूजा में गाया जाता है। इसकी रचना सन् 1870 के आसपास पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी ने की थी, जो आर्य समाज से संबद्ध पंजाबी विद्वान और समाज-सुधारक थे। भजन के सरल और भावपूर्ण बोल भक्तों को भगवान विष्णु (जगदीश) के प्रति समर्पण और विश्वास का भाव सिखाते हैं। यह भारत के अधिकांश हिंदू घरों और मंदिरों में बहुत लोकप्रिय है। यह भजन ईश्वर को जगदीश, विश्वम्भर तथा अंतर्यामी कहकर पुकारता है — ये सभी विष्णु पुराण में वर्णित सर्वव्यापी परमतत्त्व के नाम हैं, जिसकी प्रतिध्वनि भगवद्गीता के दशम अध्याय, श्लोक 20 में भी मिलती है, जहाँ भगवान स्वयं को सबके हृदय में स्थित बताते हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Pandit Shraddha Ram Phillauri
क्या आप जानते हैं?
रचना और रचयिता
यह भजन 'ॐ जय जगदीश हरे' पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी द्वारा सन् 1870 के आसपास रचित है। यह आरती के रूप में प्रसिद्ध है और प्रायः मंदिरों व घरों में संध्या आरती के समय गाया जाता है।
संरचना और विशेषता
प्रत्येक पद के अंत में 'ॐ जय जगदीश हरे' की पंक्ति दोहराई जाती है, जो इसे सामूहिक गान के लिए उपयुक्त बनाती है। कुल आठ पद हैं, जिनमें भक्त अपनी दीनता, ईश्वर की सर्वशक्तिमानता और करुणा का वर्णन करता है।
आध्यात्मिक संदेश
इस भजन में भक्त ईश्वर को 'पूरण परमात्मा', 'अन्तर्यामी', 'करुणा के सागर' आदि संबोधनों से पुकारता है। यह भक्ति की भावना को सरल शब्दों में व्यक्त करता है कि ईश्वर ही एकमात्र शरण हैं और वे सबके संकट हरने वाले हैं।
प्रचलन और महत्व
यह भजन हिंदू धर्म में सबसे अधिक गाए जाने वाले आरती भजनों में से एक है। इसे 'आरती' के रूप में जाना जाता है और यह प्रायः दीपक या अगरबत्ती के साथ गाया जाता है। इसकी लोकप्रियता का कारण इसकी सरलता और भावपूर्ण शब्द हैं।
भाषा और शैली
यह भजन ब्रजभाषा और खड़ी बोली के मिश्रण में लिखा गया है, जो इसे उत्तर भारत में सहज ग्राह्य बनाता है। इसमें 'स्वामी' और 'भर्ता' जैसे शब्द ईश्वर के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं।
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